पढ़ई के तनाव ह, लेवत हे लइकामन के परान ल!

पढ़ई के तनाव ह, लेवत हे लइकामन के परान ल!

Gulal Prasad Verma | Updated: 14 Jun 2019, 05:06:21 PM (IST) Raipur, Raipur, Chhattisgarh, India

का-कहिबे...

अ नार के अ, आम के आ। जब ये सब्द सुनई देथे या फेर नान-नान लइकामन बस्ता धरे दिख जथे, त 'इसकूल म पढ़ई के दिनÓ सुरता आ जथे। काबर के इसकूल म गुरुजी के 'सुटीÓ अउ घर म ददा के 'मुटकाÓ ल नइ भुलाय हन। मेटरिक-कालेज पढ़त ले गुरुजीमन के डर लगे रहय। गुरुजी के बात ल कोनो नइ कांटय। पलट के जुवाब नइ देवंय। पथरा कस लकीर होवय गुरुजीमन के बात ह। गुरुजीमन मन लगा के पढ़ावंय अउ लइकामन मन लगाके पढ़ंय। जिनगी म जउन चरित्र, ईमानदारी, बिद्या मिले हे सब गुरुजीमन के अनुसासन के सेती ए।
फेर, आज जमाना बदल गे हे। सिक्छा ह बेपार अउ इसकूल ह दुकान बन गे हे। समाज म तो बस एक-दूसर के देखा-देखी चलत हे। कइसो होवय बड़का महंगा पराइवेट इसकूल म लइका ल पढ़ाय बर हे, कांही होवय लइका ल जादा नंबर पाय बर हे। लइका के मन रहय चाहे झन रहय, फेर डाक्टर- इंजीनियर बनाय बर हे।
सच बात ए! रहि-रहि के एकझन अनजान नोनी के सुरता करके आंखी म आंसू आ जथे, जउन ह सिरिफ ऐकर सेती अपन परान ल दे दिस कि वोहा डाक्टरी के पढ़ई नइ करे बर चाहत रहिस। डाक्टरी पढ़ई वोकर बस म नइ रहिस। आत्महतिया करे के पहिली चिट्ठी लिखे रहिस कि रट नइ सकय। पढ़थे तेन सुरता नइ रख सकय। वोला आज तक एकझन अइसे मनखे नइ मिलिस जउन वोकर से कहितिस के जब तोर मन नइ लगय त पढ़ई छोड़ दे। वाह रे जमाना! वो नोनी के कोनो नइ सुनिन। सब गियान बघारत रहिन होही। समझात रहिन होही- देख गुड्डी अतेक बड़का कालेज म तोर एडमिसन होय हे। एक पइत रो-धोके तेहा इहां ले डाक्टरी के डिगरी ले-ले, फेर अतेक कमई करबे के झन पूछ। तोर बिहाव बड़का घर म तको होही।
घर-घर के इही किस्सा हे। ए पढ़व-वो पढ़व। वोकर लइका ऐ पढ़त हे, वोकर लइका वो पढ़त हे। ऐकर लइका ए बनगे, वोकर लइका वो बनगे। दाई-ददामन नानपन ले लइकामन उप्पर अपन मरजी थोपई सुरू कर देथें। वोकरमन के एक्केच जिद के वोकर औलाद उही करंय जउन वोमन चाहथें। तेकरे सेती लइकामन कुंठित होवत हें। आत्महतिया करे बर तको मजबूर हो जथें। कालेजभर के नइ, बल्कि मिडिल इस्कूल, हाई अउ हायर सेकंडरी इस्कूल के कतकोनझन लइकामन तको फेल होय, सेपलीमेंटरी आय ले आत्महतिया कर लेथें। अपन लइकामन से जरूरत ले जादा उम्मीद पलइय्या दाई-ददामन सोचंय के सचिन तेन्दुलकर के दाई-ददा ह बीए के डिगरी लेय बर वोकर पाछू पड़े रहितिन त का आज 'भारत रत्नÓ होतिस?
आजकाल के दाई-ददामन अपन लइका ल सुतंत्र न छोड़त हें। वोला अजाद हवा म सांस लेय बर नइ देवत हें। वोला हुनर नइ सिखावत हें। वोकर उप्पर जबरन पढ़ई थोपत हें। तनाव देवत हें। अपन मनमरजी-मनमानी चलावत हें, त अउ का-कहिबे।

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