हमर बोली-भाखा म देसभक्ति गीत

साहित्य

By: Gulal Verma

Published: 13 Aug 2019, 04:20 PM IST

भा रत माता के वंदना म अउ फिरंगीमन के विरोध म हरस्तर के साहित्य लिखे गीस। इहां तक ले छत्तीसगढ़ी,, भतरी, हल्बी, गौड़ी, कोरकू समेत अउ कोनो आंचलिक भासा घलो नइ छूटिस। मुरिया पाटा गीत के एक बानगी पढ़ब-
'इरखा बइर कुचर नहीं। मारा-पेटा किबर नहीं। मया प्रेम से रहू माता। तुचो जय- जय माता, तुचो जय-जय माता। देस काजे जिउक सिखूं, देस काजे मरूक सीखूं, देस सेवा करूं माता। तुचो जय-जय गाऊं माता, भारत माता, भारत माता, तुचो जय-जय गाऊं।Ó
एक मुरिया के गाए गीत ह भारतवासीमन के गीत आय। हे भारत माता दुआ-भाव अउ मारपीट ल छोड़ के दया-भाव के संग राहन।
ठाकुर पूरन सिंह सुराजी सिपाही रहिस। नगरी, सिहावा अउ बस्तर डहर ठाकुरजी के हल्बी कविता रासटरीय आंदोलन बर जड़ी-बूटी बनगे-
'स्वतंत्र रलो आमचो भारत, एक हजार बरस आगे हरिक पदिम देस थे रलो, तेलेबे कहानी जागे। सत धरम ले तोर लता, रजो धरम चो छाप, सरगुन ने गोटी धान ने, पोल निकरते रला पाप...।Ó
ए कविता म ए बताए गे हे के, पहिली हमर भारत देस ह सुतंत्र देस रहिस हे। जिहां सत-धरम के राज रहिस। समे म बरसा होवत रहिसे, तिही पाय के भरपूर फसल होवत रहिसे। तभे तो हमर देस के मन लाघंन-भूखन अउ दुखन ल नइ जानत रहिन। फेर, जब ले फिरंगी अइन तब ले तंगीच-तंगी होगे।
भारत के गोंड़ बइगामन घलो भारत के रक्छा खातिर किरिया खाय रहिन। जउन ह एदे गोड़ी कविता म जानबा मिलथे- 'हम भारत के गोंड बइगा, भारत ले रे। हम भैया छाती अड़ाबो। हम तो खून बहाबो, भारत ख्यार। अंगरेजन ल मार भगाबोन भारत ले रे। हम भारत के भाई-बहिनी, मिल के करबो रक्छा, अंगरेजन ल मार भगाबो। करबो अपन रक्छा भैया, भारतख्यार। हम भारत के गौड़ बइगा। कर देबो जान निछावर, भइया भारत ख्यार। अंगरेजन ल मार भगाबो, भारत ले रे।
ए कविता के मतलब ए होथे- हमन भारत के रहवइया अउ बइगा हरन। हमन ल आजाद रेहे के ललक हे। भारतमाता के रक्छा खातिर चाहे छाती म गोली झेले बर परय, चाहे लहू बोहाय बर परय। हम सबो गोड़ बइगा भाईमन ले बिनती हे के, फेर अपन देस खातिर परान निछावर करे के दिन आ गे हे।
छत्तीसगढ़ के आसु कवि कोदूराम दलित ह अजादी के समे जउन कविता लिखे रहिस वोमा कुट-कुट के देस परेम भरे रहिस।
'अपन देस आजाद करे बर,
चलो जेल संगवारी।
कतनो झिन मन चल जेईन,
आइस अब हमरो पारी।
जहां लिहिस अवतार किरिस हर,
भक्तमन ला तारिस
दुस्टमन ला मारिस अउ
भुइंया के भार उतारिस।
उही किसम जुर मिल के
हम गोरा मन ला खेदारी
अपन देस आजा करे बर
चलो जेल संगवारी।Ó

Gulal Verma Desk
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