भाई-बहिनी के पिरित के तिहार 'राखी

भाई-बहिनी के पिरित के तिहार 'राखी

Gulal Prasad Verma | Publish: Aug, 13 2019 04:26:13 PM (IST) Raipur, Raipur, Chhattisgarh, India

संस्करीति

राखी या रक्छा बंधन तिहार ल पूरा हिन्दू समाज ह सावन के पुन्नी के दिन मनाथें। राखी तिहार के परंपरा का ए? कब ले चले आवत हे? ऐमा विद्वानमन के अलग-अलग बिचार हावय। कोनो विद्वानमन के कहना हावय के ऐकर परथा राजा बली के समे ले चले आवत हे। जब राजा बली निन्नाबे जग पूरा करके सौवां जग पूरा करे बर बइठिस तब गुरु सुकराचार्य वोला मंत्र 'ये न बध्यो बली राजाÓ...। पढ़ के रक्छाबंधन बांधिन जउन मंत्र ला आज ले पंडितमन रक्छा बंधन बांधे के बेरा पढ़थें।
कुछ दिन के पाछू जब छत्रीय राजामन एक-दूसर सो जुद्ध करे बर जाय लागिन तब पंडितमन अपन सुभ आसीरबाद देय के रूप म हाथ म रक्छा बंधन तो बांधबे करंय अउ छत्रारियमन अपन जुद्ध म जवइया पतिमन ल, भाईमन ल रक्छा बंधन बांध के ए कामना करके लड़ई म भेजंय के, हमर सतीत्व धरम ह उनकर रक्छा करय अउलड़ई म बिजई बनावय। जेमा उनकरों चूड़ी अउ सेन्दूर के रक्छा हो सकय। सत्रु सो ले रक्छा हो सकय अउ देस म सान्ति रहय।
जइसे-जइसे समे बदलत गीस ए तिहार ल मनाय के ढंग घलो बदलत गीस। पहिली बाम्हनमन रक्छा बंधन या राखी ल छत्रीय, वैस्य अउ सूद्रमन ल बांधय अउ दछिना लेवंय। गंवईमन म आज ले परथा चालू हे। अब बिहनिचमन भाई ल राखी बांधथें। भाई के बड़ आदर-सनमान करके वोला बढिय़ा-बढिय़ा मिठई पेड़ा, फल-फरहरी खवायें अउ ए कामना रखथें के, भाई हमर सोहाग के रक्छक आय अउ हमार रक्छा करही।
भाई-बहिनी कहूं दूरिहा-दूरिहा म रथें तब बहिनी अपन भाई बर बढिय़ा राखी लिफाफा म बंद करके डाक म भेजथें। रक्छा बंधन तिहार आय के पंदरा दिन पहिली ले डाक म राखी भेजई चालू हो जाथें। बहिनी के राखी पा के भाई खुसी म भभर उठथे। बहिनी के मन म भाई ल राखी भेज के कतका सुख होथे ऐेहा वोकरे अनुभव करे के बिसय आय।
भाई के मुरवा म राखी बांध के वोकर माथ म रोली के टीका देथे तव भाई अउ बहिनी के मन गद्गद् हो जाथे। लइकइ के खेलकूद, झगरा, लड़ई, खाना-पीना सब के सुरता आके आंखी म झूले लागथे। दूनों के मन म नावा सनेह अउ उमंग भर जाथे। आज के सुभ परब के दिन जउन लड़की के एकोझन भाई नइ रहंय तव राखी बांधे बर एक झन भाई बनाथे। वोकर माथ म रोली के टीका लगा के बड़ा आदर से राखी बांधथे जउन नता ल दूनों अपन जिनगानी भर निभाथें।

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