गांव-गंवई के संस्करीति-संस्कार ह बचे रहय

गांव-गंवई के संस्करीति-संस्कार ह बचे रहय
गांव-गंवई के संस्करीति-संस्कार ह बचे रहय

Gulal Prasad Verma | Updated: 21 Aug 2019, 05:26:39 PM (IST) Raipur, Raipur, Chhattisgarh, India

का-कहिबे...

ए अर्र्...त्ता काये बबा। अर्र्...त्त्-त्त् काबर कहिथें।
बेटा! जब बादर म बदरी छाथे। झमाझम बारिस होथे। भुइंया के पियास बुझाथे। खेत म पानी भरथे। किसान के चेहरा खिलथे। बतर के बढिय़ा समे आथे। नागर-बइला धर के किसान खेत जाथे। खेत म धान बोथे। त किसान के हिरदय ले निकलथे - अर्र्...त्ता, अर्र्...त्ता। फेर अब तो खेत म नागर बइला नइ दिखय। टेक्टर म खेती-किसानी होवत हे।
बबा! किसानमन भगवान के धन्यवाद कब करथें?
बेटा! जब किसानमन धान लुथें। करपा बांधथें। बइला गाड़ी म धान डोहारथें। बियारा म धान बगराथें। बेलन-दौरी से धान मिंजथें। धान ह कोठी म धराथे, त किसानमन भगवान के धन्यवाद करथें। फेर, अब तो कोठी नदा गे। मिंजथे तहां ले सिद्धा धान ल सोसाइटी म बेचत हें।
बबा! लोगनमन काबर कहिथें के जमाना बदल गे हे? समे बदलत हे?
बेटा! बड़ दुख अउ चिंता के बात हे के आज कोनो ककरो बात सुने बर तइयार नइये। बने बात ल एक कान ले सुन के दूसर कान ले निकाल देथें। सरेआम गलत काम होवत हे। बेईमानी अउ अय्यासी दिनोदिन बाढ़त हावत हे।
बबा! अउ का-का बदल गे हे?
बेटा! हाल ए होगे के बदलत जमाना म ककरो तीर टेम तको नइये। जेती देखबे वोती सब भागत-दउड़ नजर आथें। लइका ल महतारी के अंचरा म लुकाय बर नइ मिलत हे। ददा के बांह म झुले बर नइ मिलत हे। वाह रे जमाना! आज लइका ल अंजरी धरा के रेंगाय के समे तको नइये। दूध के कटोरी के जगा प्लास्टिक के बाटल धरावत हें। लबारी अउ देखावा के जमाना हे। सुग्घर-सुम्मत के बात कहइया-धरइया दूरिहावत हें। पइसावाले के आगू म चरितवाला ल फेल अउ छोटे कहइया-मनइया-समझइया लोगन एक खोजबे त दस मिल जथे, बेटा!
बबा! हमर छत्तीसगढ़ के कुछु बात बता?
बेटा! जब सेमी-भांटा के खोइला रांधथे। लोटा म पहुना ल पानी देथें। कुसियार के बारी म गुड़ बनाथें। ढेंकी म धान कुटथें। मुड़ म फीता गातथें। दूसर घर आगी मांगे ले जाथें। डोकरी दाई ह कहिनी-किस्सा सुनाथें। भोजली-जंवारा के गीत गाथें। बांसगीत, ददरिया गाथें। कुआं म पानी भरथें। चउरा म बइठ के ढेरा अंइटथे। हाथ म गोदना गोदाथें। छुही म घर लीपथें, त सबो के दिल से निकलथे- ए मोर छत्तीसगढ़ महतारी के महिमा अपरम्पार हे।
बबा! सहर के रहइयामन ल कब अउ का जिनिस बर गांव के सुरता आथे?
बेटा! फागुन म नगारा बाजथे। नवरातरी म जसगीत गाथें। दाई ह तसमई बनाथे। लइकामन पहाड़ा पढ़थें। अंडा पान म अंगाकर रोटी पोवाथे। तरिया म मतावर मातथे। त सहर के रहवइयामन ल कंडिल के अंजोर। चंदा रात म छुआछुल। तरिया के तउरई, बांटी-भउंरा, गिल्ली-डंडा के खेलई। संगी-संगवारीमन के संग किंरजई के सुरता आथे।
जब बिदेसी संस्करीति-संस्कार के परभाव म हमर छत्तीसगढ़ी संस्करीति- संस्कार नदावत हे, तभो ले जादा लोगनमन ल ऐला बचा के चिंता-फिकर नइये, त अउ का-कहिबे।

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