आत्मनिरभर

नानकीन किस्सा

By: Gulal Verma

Published: 03 Dec 2019, 04:06 PM IST

मंच म बइठे सरपंच अउ गांव के सियानमन गोठियात रहंय। ततके बेरा एकझन जवान जेहा सहरिया कस दिखत रहाय अपन मोटरसाइकिल ल खड़ा करिस अउ मंच म बइठे जम्मोझन के पांव छुइस। जम्मोझन अकबका गें। सरपंच पूछिस - कोन ***** बाबू? चिन्हारी नइ आत हस? जवान छोकरा बताइस- मंय इही गांव के लइका हों। रामू के छोटे बेटा, जेन ह सहर पढ़े बर गे रेहेंव।
अतका ल सुन के जम्मोझन मुचमुचाइन। सरपंच पूछिस- नौकरी -चाकरी लगिस बाबू? जवान छोकरा कहिथे- हव कका, पटवारी बनें हंव। मोर पोसटिंग इही गांव के पंचायत म हे। आपमन के सेवा करे बर आय हंव। संग म मोर एकठन सपना घलो हे कका। सरपंच कहिस- का सपना हे बेटा? जवान छोकरा बताइस- मोर गांव के जम्मो पढ़इया-लिखइया संगवारीमन ल पढ़-लिख के आत्मनिरभर बने के गुन बताय बर चाहत हंव। गांव देहात म परतिभा के कमी नइये। कमी हे त सही दिसा देखइया के। मेहनत करही अउ सही दिसा म आघू बढ़ही त हमर गांव के संग-संग हमर देस घलो बिकास करही अउ आत्मनिरभर बनही।

Gulal Verma Desk
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