देसभगत गांव जोंधरा

आवव मोर गांंव

घोटिया गांव ह पलारी ले तीन किलोमीटर दूरिहा म बसे हे। हमर गंवई गांव म घरोघर गाय-गरु घर- अंगना के सोभा बढ़ाथे। गाय-गरु के सेवा जतन करे म बड़ आनंद आथे। गाय-गरु ल हमर जीवन ले अलग करके नइ देखे जा सके। महतारी के दूध नइ आय म गउ के दूध लइका बर महतारी के दूध बरोबर होथे। गांव के लोगनमन सबो तीज-तिहार ल मिलजुल के मनाथें। तीज-तिहार के बेरा म लोक-रंग म रंगे लोकगीत ल सुन के तन-मन लहस जथे। रमायन पारटी छ_ी-बरही म घरोघर जाके भगती-भावना जगाथे। भगवान के संदेस ल जन-जन म पंहुचा के भगती के बीज बोथे।
गांव म जेन सुख अउ सांति के अनुभो होथे वोहा सहर के जिनगी म कहां मिलही। सहर म तो ककरो करा ककरो बर बेरा नइ समे नइये।
सुग्घर हे मोर गांव, जिंहा अमरइया के छांव।
घोटिया जेकर नांव, बटरोही धर तो ले पांव।
गांव के गोठ ल सुन के मन म खुसी छा जथे। गांव म सुख अउ सांति के वातावरन होथे। लोगनमन एक दूसर के दुख पीरा ल आपस म बांटथे । बुता नइ राहय तभो ले ककरो दुवारी ककरो चंउरा म बइठ के आनी-बानी के गोठ ल बांचथे। ककरो घर कांही नइ राहय तभो ले हाबय अइसे मानथे काबर कि सबो झन एक दूसर ले मिल-जुल के रथे। कोनो ल कांही जिनिस के जरुरत पऱथे त परोसी घर ले मांग के लान लेथे।

Gulal Verma Desk
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