गोबर दे बछरू-गोबर दे, चारों खूट ल लीपन दे

बिचार

By: Gulal Verma

Published: 29 Jun 2020, 05:56 PM IST

अभीकुन छत्तीसगढ़ के सरकार ह गोबर लेय के योजना के घोसना करिन। ये योजना से मोर जेहन म गोबर के सुरता आए के सुरू हो गिस। हमन नान-नान रेहेन। दाई ह बिहनिया बड़े फ जर उठ के पहिली बुता जेन करे, वो रहाय कोठा म जाके गाय, बइला, भइंसा के गोबर रपोटे के। जम्मो गोबर ल अउ गरवामन के रातकुन के बांचे खली, चूनी, भूसी अउ पेरा ल झउंहा म भर के कोठार म बने घुरवा म डोहारे। अइसन हरेच रोज करे। घुरवा ह धीर-धीर बछरभर के गोबर ले भरत जाए। साल बीतत-बीतत घुरवा के गोबर अउ दूसर कचरामन खातू बन जात रिहिस।
अकती म खेत के पूजा-पाठ करे के बाद कांटा-खूंटी बिने के सुरू हो जाए। ददा ह बिहनिया ले गाड़ी फ ांद के कोठार के घुरवा के गोबर ल खेत म लेगे के सुरू करे। ददा ह खातू ल खेत म कूढ़ो के अउ खातू लाय बर जाय। दाई, मोर भाई अउ मेहा कूढ़ोय गोबर ल खेत के भुइंया म झउंहा धर के बगरान। अइसन करे ले भुइंया के उपज ह बाढ़ जाय। पहिली जमाना म आजकल के असन खातू, दुकानमन म नइ मिलित रिहिस। अउ मिले तभो घुरवा के गोबर खातू ले बने नइ रहात रिहिस। बरसात आए के बाद उही गोबर खातू मिले भुइंया म नागर फ ांद के धान बोन। अइसन खातू के रसा ल सोंख के भुइंया ह घलो बड़ जलदी पोठ धान पइदा कर देय।
हफ ता म कोनो दिन, अउ जेन दिन बड़ घाम रहाय, तेन दिन दाई ह कोठार गोबर ल झउंहा म लेग के भुइंया मा पटक देय। वोमा पेरोसी मिंझार के साने। वोकर बाद भुइंया म बड़का-बड़का लोई बना के गोबर ल मोट्ठा रोटी अइसन फ इला के छेना थापे। कोनो छेना ल भुइंया म थापे अउ कोनो ल कोठार के भाड़ी म।
कभु-कभु कोठा के पाछू के दीवाल (परदा) म थापे। खाल्हे ले ठाढ़ हो के दाई ह गोबर ल छानी-परवा के खाल्हे तक ले फें क के थाप देय। दीवाल म छेना थापे बर दाई ह गोबर के लोई ल ऊपर डहान फेंकें, त कभु निसाना जुच्छा नइ जाए। लाइन ले छेना थोपे जाए। दू-तीन बाद छेना ह सूखा जाए तहान वोला पठउंहा म अउ डेंकी कुरिया म लाइन ले गांजे जाए। गरमी दिन म छेना जादा थोपे जाए। जाड़ अउ बरसात म बउरे के लइक छेना थोपे जाए। बछरभर इही छेना ले देवता -धामी ल हूम जग दे जाए। बिहनिया-संझा चूल्हा म लकड़ी सुलगाए बर छेना ल चूल्हा म राख के वोकर ऊपर माटीतेल डार के आगी सुलगाए जाए। अइसन करे ले आगी ह लकर-धकर सुलगे के सुरू हो जात रिहिस।
संझाकुन अंगना म सिगड़ी ल सुलगाए बर घलो छेना म माटी तेल डार के आगी सुलागए जाए। वोकर ऊपर कोयला ल डार दे जाए। जब सिगड़ी ह बने धधके बर लग जाए, तहाने वोला रंधनी कुरिया म चूल्हा के बाजू म राख के वोमा दार के डिबडिबी जघा देय जाए। दार ह थोरकुन बेरा म चुरथे, उही पायके वोला पहिली ले चघा दंय। दार के बाद इही सिगड़ी म कसैली म दूध ल तीपोय बर रख दंय।
जाड़ दिन म जब ठुनठुनी धरे के सुरू हो जाए, त इही छेना ले आगी सुलगा के सब्बोझन आगी तापन। खेत नइते कोठार म कचरा, कांटा-खूंटी ल लेसे बर घर ले सुलगाए छेना ल धर के लेगे जाए। वोइसने पूजा करे बर माता देवाला जान त घर ले सुलगाए छेना ल धर के हूम दे बर लेगन। पहिली जमाना म हर घर माचिस नइ रहात रिहिस। कोनो ह पहिली छेना सुलगा लेय त वोकर घर पास-परोस के मन आगी मांगे बर जांय। सुलगत छेना ले अपन घर के चूल्हा ल सुलगाए। आगी लेय अउ देय के परथा हमर छत्तीसगढ़ राज म बड़ जुन्ना हे।
आजकल असन वो जमाना म कुरिया म फ र्रस नइ रहात रिहिस। बिहनिया ले घर के माइलोगनमन एकठन बालटी म गोबर ल पानी डार के घोर ले। वोकर बाद पोतनी धर के कुरियामन के भुइंया ल लीपंय। अंगना ल दू-तीन दिन के आड़ म लीपे जाए। ऐकर बर बालटी म गोबर ल पानी म घोर के अंगना म रितो देय जाए। वोकर बाद खरेरा बहारी ले अंगना ल लीपे जाए। हर तिहार के पूजा-पाठ के जगा, अंगना अउ माता देवाला ल गोबर ले लीपे के परंपरा रिहिस। गंवई म जब कुंवार अउ चइत नवरात के तिहार म जंवारा बोए जाएं, त हरेच रोज गोबर ले अंगना ल लीपे जाए। सुरहुति तिहार के दिन मंझनिया अंगना ल गोबर म लीप के दीया-बाती करे के परंपरा रिहिस।
गंवई म अउ घर म कोनो सुभ कारज के सुरुआत करे के पहिली गोबर ले गौरी -गनेस बना के पूजा करे जाए। वइसे आजो ये परंपरा गांव अउ सहर म घलो चलत हावय। घर म जचकी होय त छवारी के नार ल गोरसी म छेना सुलगा के जराए जाए। ऐकर ले सब्बो गंवई जान डरत रिहिस कि काकरो घर म नान्हें लइका आए हे।

Gulal Verma Desk
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