नदावत हे खुमरी ह

हमर संस्करीति

By: Gulal Verma

Published: 29 Jun 2020, 06:03 PM IST

छत्तीसगढ़ के संस्करीति के एकठन परमुख चिन्हारी आये खुमरी ह। किसानी काम म खुमरी के अब्बड़ महत्व हे। खुमरी ल मुड़ी म ओढ़े जाथे। ये सबो किसानी करइया किसानमन के घर- कोठा के खूंटी म टंगाये खचित मिल जाही। आसाढ़ के बांवत पानी ले येहा निकलत कुंवार के कमती होत पानी तक किसानमन के संगवारी होथे।
खुमरी बनई ह घलो एक कला आय। सबोझन ल खुमरी बनाय बर नइ आय। छत्तीसगढ़ म बांस के काम करइया कंडरा, बिरहोर, कमार, धनवारमन खुमरी ल बनाय के बुता करथें। बांस ल पतली-पतली चीर के कमचील सहीं बनाय जाथे। कमचील ल बारीक छील के चिकना करथें, फेर वोला पांत धर के गाथे जाथे। पहिली के कईझन सियानमन अपन घर म खुमरी गांथ डारंय। अब के मन ल जादा कोई ल नइ आय।
खुमरी ल गाथे के बाद बेचाय बर आसाढ़ तीर म हाट बाजार म पहुंच जाथे। छोटे-बड़े कई आकार म मिलथे। किसानमन बिसा के लानथें अउ वोला छाये के तैयारी करथें। परसा पान, कुररू पान, मोहलइन पान म येला छाये ले बने होथे। अब तो जंगल के कटई के मारे ये पानामन मिलय नइ. तब आजकल प्लास्टिक के झिल्लीमन ले घलो लगाय जात हे। खुमरी दू भाग म बने रहिथे। पहिली भाग के ऊपर पाना, झिल्ली ल छाये के बाद दूसर भाग ल ऊपर ल चपक देथे। डोरी ले कस के बांध देय ले ऐति-ओति नइ सरके। ऐदे फेर तैयार होगे खुमरी। छाये के बाद एकठन डोरी लगा देथं,े ताकि ओढ़े के टेम डोरी ल नरी बले फंसाये बर बने अउ घर म रखे बर हे त खूंटी म अरोय बर काम देय।
खुमरी ल गोल आकार म पहाड़ी सहीं बनाये जाथे। येकर गाथना बड़ सुग्घर ढंग ले बने रहिथे। आजू-बाजू छत सहीं अउ बीच ह मुड़ी म मांड़े बर गड्ढा रहिथे। ऊपर ले उतारू होय ले पानी ढर जाथे अउ ओढ़इयामन पानी ले नइ भिंगय। नंगत घाम के बेरा घलो ओढ़े के काम आथे।
नांगर फांद किसानमन खुमरी ओढ़ के निफिकरी कमाथे। बियासी के बेरा मुड़ी म खुमरी अउ देहे भर कमरा ल चारोमुड़ा गठान बांध के खेत म दिनभर कमावत रहिथें। ऊपर के पानी ले खुमरी अउ सावन के सलूपा जाड़ ले कमरा ह किसानमन ल बचाय रहिथे।
खुमरी ल ओढ़ के कईठन बुता हो जाथे। अलग से वोला हाथ म धरे के जरूरत नइ होय ले सुभीता हो जाथे। बरदी चरइया बरदिहामन अउ छेरी-पठरू, भेड़ी चरइयामन घलो खुमरी ओढ़ के चरावत देखे ल मिल जाथे। छानी के खपरा लहुटात अउ पानी गिरत खेत जाए म घलो खुमरी बड़ उपयोगी होथे।
समे के संग अब खुमरी के सौक ह घलो बुतात हवय। अब तो रेनकोट पहिर के खेत जाथें। अभी के पीढ़ी ह कमरा ओढ़े बर लजाथें। बाजार-हाट म अब कम देखे ल मिलथे।

Gulal Verma Desk
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