चिरई-चिरगुन के जात-धरम होतिस त बादर ले लहू बरसतिस!'

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Published: 29 Jun 2020, 06:15 PM IST

पंछी बनूं उड़ती फिरू मस्त गगन में, आज मैं आज़ाद हूं दुनिया की चमन में, (हिल्लोरी-हिल्लोरी ओ ओहो)। ओ मेरे जीवन में चमका सवेरा, ओ मिटा दिल से वो ग़म का अंधेरा, ओ हरे खेतों में गाए कोई लहरा, ओ यहां दिल पर किसी का न बैरा, रंग बहारों ने भरा मेरे जीवन में, आज मैं आज़ाद हूं दुनिया की चमन में, पंछी बनूं...।Ó हिंदी फिलिम चोरी-चोरी के ये गीत फिजूल के दुनियादारी के बंधन ले मुक्ति के बात कहिथे। हिरदय के निरमलता अउ पवित्रता के संदेस देथे। संग म कोनो भी किसम के बैर, हिंसा, बुराई से दूर रहे बर सिखाथे।
फेर, आज के समे म सब उलटा-पुलटा चलत हे। बने बात ल कोनो कान नइ धरंय। ये आज के मनखे बड़ सुवारथी, मतलबी होगे हें। ऐमन पद, पइसा अउ पावर बर ककरो भी बिगाड़ कर सकथे। ये धरती, ये दुनिया ल अपन जागिर समझे बर धर ले हें। हद तो ये हे कि धरम के नांव म लोगन ल एक-दूसर ले लड़ाय के लाइसेंस मिले हे जइसे बेवहार करथें। गनीमत हे के चिरई-चिरगुनमन ल पता नइये के वोकरमन के धरम-मजहब, जात का हे, नइते रोज बादर ले खून बरसतिस!
का घोर कलयुग आ गे हे? नइ आए हे, त आज ये सब जउन होवत हे, का ऐहा कम हे? सबो धरम म सच, अहिंसा, परेम, सद्भाव, भाईचारा, नैतिकता, सद्चरित्र, ईमानदारी, सेवा, तियाग, दान, माफी के सिक्छा दे गे हे। फेर, आज दुनिया म धरम अउ मजहब ह अइसे लहू से रंगत जावत हे, जइसे धरम-मजहब के मतलबेच ह बदल गे हे।
इतिहास गवाह हे, कतको पइत धरती मइया ह लहू से लाल होय हे। कतको सभ्यतामन के बिनास होय हे। अउ, कतेक देस बरबाद-तबाह होय हे तेकर तो गिनती नइये। तभो ले लागथे के ऐकर से सबक सीखे बर कोनो नइ चाहत हें। सब मनखे तो हाय-हाय म जुटे हावंय। लोगनमन अपन जात, समाज, खानदान, धरम अउ औलाद ले जादा नइ सोच सकत हें। का जमाना आ गे हे। अब तो भगवान अउ महापुरुसमन के जात खोजत हें।
का भगवान परसुराम ह सिरिफ बामहनमन के, राम ह छत्रियमन के, किरिस्न ह राउतमन के, अग्रसेन ह बनियामन के, महावीर ह जैनमन के अउ वाल्मिकी ह दलितभरमन के भगवान अउ महापुरुस ए। फेर, वाह रे मनखे अउ वोकर नानकुन सोच। अपन सुवारथ बर भगवान अउ महापुरुसमन ल जात-बिरादरी के ताना-बाना म फांसत हें। मनखे ले बने तो चिरई-चिरगुनमन हें, जउनमन देस, परदेस, जात, बिरादरी, समाज के सीमा ल नइ मानंय।
आज के ये सब हालत ल देख के हिंदी फिलिम सेहरा के गीत के सुरता आथे - 'पंख होते तो उड़ आती, रसिया ओ ज़ालिमा, तुझे दिल का दाग़ दिखलाती। किरनें बन के बाहें फैलाई, आस के बादल पे जाके लहराई, दूर से देखा मौसम हसीं था, आनेवाले तू ही नहीं था, रसिया ओ ज़ालिमा, तुझे दिल का दाग दिखलाती..।Ó
जब मनखे के दिल, दिमाग, मन भर म नइ, बल्कि वोकर आत्मा घलो म दाग लगत जावत हे। धरम के नांव लेके अधरम करत हें। तभो ले अपन किये बर थोरको पछतावा करत दिखई नइ देवत हें, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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