जिनगी के उदासी ल चिरई कस उडिय़ाय बर परही!

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Published: 27 Jul 2020, 06:11 PM IST

मितान! हिंदी फिलिममन के कतकोन अइसन गाना हे, जेन ल सुन के लोगनमन जिनगी म कुछु सीख ले सकथें। जिनगी के सच ल जान सकथें। आज दुनियाभर म कोरोना महामारी फइले हे। जेकर ले अमीर-गरीब कोनो नइ बाच पावत हे। अइसन म हिंदी फिलिम 'मदर इंडियाÓ के गाना - 'दुनिया में हम आये हैं तो जीना ही पड़ेगा, जीवन है अगर जहर तो पीना ही पड़ेगाÓ ल सुन के थोकिन मन ल सांत कर सकथें।
सिरतोन! 'जीना यहां, मरना यहां , इसके सिवा जाना कहांÓ। (हिंदी फिलिम मेरा नाम जोकर)। दुनिया ल छोड़व, हमर देस, परदेस, सहर, गांव-गंवई म 'कोरोनाÓ के सेती कतकोन दुख-पीरा देखे-सुने बर मिलत हे। कतकोन मनखे के इलाज चलत हे, कईझन सरग सिधार गे।
मितान! हमर देस-समाज म इहू कहे जाथे - 'होय सोई राम रचि राखाÓ, मरइयामन ल तो मरेच बर रिहिस हे। मउत ल कोनो नइ टार सकय। मरई वोकर किसमत म लिखाय रिहिस। तेकर सेती जादा झन चिचियाव। फेर, अइसनमन के बात ल मान के बेमारी से बांचे के कुछु उदिम नइ करबोन त 'डॉक्टर का, भगवान घलो ह कोनो ल नइ बचाय सकयÓ। ओती बर दूसर देस-परदेस कमाय-खाय बर गे लोगनमन म अपन-अपन गांव-सहर लहुट गें। अब वोकरमन तीर रोजी-रोटी के समसिया हे। गांव म रहइयामन पहिलीच ले बेगार बइठथे हें। पढ़े-लिखे लइकामन तो जादा ठहला किंजरत हें।
सिरतोन! अब तो गांवमन म खेती बेवस्था म तको लोगनमन ल बनी-भूति नइ मिलत हे। खेती-किसानी म जादा फाइदा नइ होय ले लोगनमन के पालन-पोसन नइ होय पावत हे। आज के आधुनिक जुग ह मसीन से उत्पादन ल तो संभव बनाय हे, फेर उही जुग ह एक बड़े गरीब वर्ग (सर्वहारा वर्ग) ल जनम घलो देय हे, जउनमन वो मसीन के सेती तकलीफ ल भोगत हें। दुख-पीरा ल भुगतत हें। जब कभु आधुनिक भारत के चित्र ल बना के वोमे रंगमन ल भरे जाही त वोमे मटमैला रंग जादा होही, जउन ह गरीबमन के दुख-पीरा के चिन्हा होही। कतेक मनखे गरीब हें, वोमन तकलीफ सहत हें, तेन ल देखाही-बताही।
मितान! कोरोना ह एक बात ल तो बनेच ढंग ले समझा दिस हे कि बड़हर-पूंजीपतिवाले मनखे हो या फेर गरीब मनखे, जउन ह मोला छुपाही वोहा 'रिहिसÓ हो जही। अतकेच नइ, देस ह बहुतेच समे ले काम-बुता, कारखाना, बेपार के मामले म पथरा के मूरति कस ठाढ़े हे। कहुं दुनियाभर म मंदी के चलत ये मूरति ह 'माटी के पुतलाÓ कस भरभरा के गिर सकत हे।
जब किसम-किसम जात, समाज, बिरादरी के चिरईमन रातकुन एके रूख म आके बिसराम-आराम करथें। फेर, बिहनिया होथे तहां ले अपन-अपन रद्दा डहर उडिय़ा जथें। अइसने कोरोना के सेती परिवार जइसे रूख म अब्बड़ दिन ले सकलाय, ठहला बइठे लोगनमन ल अब कुछु न कुछु काम-बुता म लग जाय बर परही। ये मुसकुल समे म अब जिनगी ल असान बनाय बर वो करव, जउन म आपमन अव्वल हों। इही ह जीये के सही तरीका हे। मुसकुल समे ल असानी से जीयई ह जिनगी हे। आज इही ह सबले बड़का सच ए, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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