अकेल्लापन ल दूरिहाव, राजनीति के खेल-तमासा ले!

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Updated: 24 Aug 2020, 05:04 PM IST

मितान ! मनखे के जिनगी म कतकोन पइत अइसे समे आथे के वोहा सोच नइ सकय के कति जाय। ऐती गिरे त कुआं अउ वोती गिरे त खाई। दूनों कोति मउत हे। अइसन हाल म मनखे असमंजस म पर जथे के वोहा करय त का करय?
सिरतोन! कतकोन पइत मनखे सोचथे के तबीयत का-का हो गे हे। बड़ अकेल्ला-अकेल्ला लागथे। फेर, कतकोन पइत सोचथे के अकेल्ला कहां हंव? परवार हे, संगी-जहुंरिया हे, संग म काम-बुता करइया लोगन हे। फेर, अतेक सब के बाद घलो अकेल्लापन पीछू नइ छोडय़। मानो भरे जवानी म करे कोनो पाप हो, जउन ह बुढ़ापा म जुन्ना पीरा कस कसकत हे।
मितान ! पहिली सुनत-पढ़त रेहेन के जउन मनखे ह सबले ऊंच (शीर्ष) म होथे, वोहा अकेल्लेच होथे। वोहा अकेल्ला हे या फेर दुकेल्ला, ये तो पता नइ। हमन तो कभु सबले ऊंच म कभु नइ रेहेन।
सिरतोन ! अकेल्लापन ह घलो अजीब बेमारी आय। मन नइ लगय। टीवी देख लिस। पेपर पढ़ डरिस। फिलिम चाट डरिस। जुन्ना संगी-जहुंरियामन ले गोठ-बात कर लिस। तभो ले आधा उमर ले बुढ़ापा म खुसरत हरेक मनखे ल अपनआप म अकेल्लेच हंव जइसे लागत होही। कोनो मनखे सोचत होही के चलव 'अकेल्लापनÓ ऊपर एकठिन फिलिम लिख दंव। फेर, 'बाहुबलीÓ के जमाना म 'अकेल्लापनÓ के फिलिम ल देखही कोन? फेर, का करंय? कोनो तो बतावंय 'अकेल्लापनÓ ले जूझत मनखे ह आखिर करय त का करय?
मितान! अइसे कहे जाथे के 'अकेल्लापनÓ ले असकटाय मनखे ह चोरी-छिपे 'पीये बरÓ सुरू कर देथे। फेर, ऐहा कोनो 'रामबानÓ उपाय नोहय। अपन ल बड़ गियानी समझइया मनखे 'राजनीतिÓ म खुसरे के सलाह घलो देथे। फेर, बताव आज के समे म उहां कोन से 'खाली जगाÓ हे। आजकाल तो राजनीति घलो ह 'प्लानÓ बना के करे जाथे। राजनीति ह तो अब 'बेपारÓ बन गे हे। 'एक रुपिया लगाव- सौ रुपिया कमावÓ सोच के अब जादाझन लोगनमन राजनीति म खुसरथें।
सिरतोन! कतकोनमन तो पांचेच बछर म अपन सात पुरखा बर धन-दौलत, जमीन-जायदाद सकेल डरथें। राजनीति म सेवा के भाव ह गदहा के सींग बरोबर नदावत हे। नैतिकता, ईमानदारी के तो नामेच झन लेवव। वोहा तो नेतामन ल कब के छोड़ के चिरई कस उडिय़ा गे हे।
मितान! आज देस म चलत राजनीति ल देख के ककरो ऊपर बिसवास नइ रहि गे हे। कब, कोन, काकर संग धर लिही, तेकर कोनो बेला बिचार नइये। सुवारथ के अइसन बवंडर चलत हे के अपनेच सरकार ल गिरावत हें। लागथे, देस म चलत राजनीति के खेल-तमासा ल देख के 'अकेल्लापनÓ ह थोकिन दूरिहा सकथे!
परवार-समाज म जइसे बेटा-बहूमन घर के सियानमन ल अपन सुवारथ बर छोड़ देथें। वोइसने राजनीति म जेन पारटी ह टिकट देथे, जीते के बाद उही ल पद-पइसा के लालच म नेतामन छोड़ देथें। राजनीति म 'बेसरमीÓ के कोनो सीमा नइ रहि गे, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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