कोन मुलुक ले तैं आए रे कोरोना

गोठ के तीर

By: Gulal Verma

Published: 07 Sep 2020, 02:48 PM IST

कोरोना... कोरोना... कोरोना... जेती देखव तेती वोकरे सोर हे, नांव सुनके सब झझकथे, कांपथे, कोन हे ये कोरोना, कहां ले आए हे, कइसन हे ऐकर रंग-रूप, हाथ-गोड़ कोनो देखे हें, न जाने हें, न पहचाने हें? बस नांव भर सुनथें, ततके मं झझक जथे। अइसे डररावथे जइसे सरकस के कोनो से ह ढिलागे हे अउ सहरभर मं ढिढोरा पीटगे के सेर ढिलागे हे। अपन-अपन घर के दरवाजा अउ खिड़की ल बंद करके रखिहौ, कोनो बाहिर पार झन निकलिहौ, नइते हबक दिही।
वाह रे बेटा कोरोना! तैं तो खूंखार आतंकवादी लादेन के बाप ले दून बाप निकल गेस। वो लादेन के झझक मं तो सिरिफ अमरीकाभर के होस गायब होय रिहिस हे, वोकर सिट्टी-पिट्टी गुम होगे रिहिस। फेर, तैं तो दुनिया मं नांव बटोर लेस संगवारी। आज तोर नांव ल सुनके अमरीका, रूस, ब्रिटेन, जापान, इजराइल, इटली, चीन, ईरान, इराक, सउदी अरब समेत दुनिया मं जतका देस हे तौंन सब भय खाथे। तैं तो अत्याचारी रावन, कंस ले कतको ओ पार निकल गेस। वो राक्छसमन के सीमा राहय, फेर तोर तो पूरा विस्व मं डंका बजत हे। एक छत्र तोर राज चलत हे। जौंन कोती तोर पांव परत हे, हवा चलत हे एके घौं मं सैकड़ों का हजारों मनखे के लास बिछत हे।
सुने रेहेन, रामायन, महाभारत अउ पुरान मं जिहां-जिहां साधु-महात्मामन पूजा करंय, यग्य, हवन करंय तिहां-तिहां जाके राक्छसमन विध्वंस कर दंय। वोमन ला मार डरंय, फेर तोर आतंक तो वोकरो ले बढ़के हे। विस्व मं जतका मंदिर, मसजिद, गिरजा, गुरुद्वारा अउ मठ-पंथ हे तिहां के मुख्य दरवाजा मं ताला ठेंसागे हे। कोनो भक्त इहां जा नइ सकत हे, जिहां कभु वोकरमन के रेलमपेल लागे राहय। पुजारीमन सब मुड़ धर के रोवत हें, एको पइसा के चढ़ौतरी नइ होवत हे। जिहां कभु रुपिया-पइसा अउ सोना-चांदी के बरसात होवत राहय, तिहां फुसका परे हे, अघेला नइ चढ़त हे।
ये कोरोना ह सबले बड़े हमला बाजारवाद ऊपर करे हे। बहुत चढ़-बढग़े रिहिस हे बाजार ह। पइसा कमाय के हवस मं पागल होगे रिहिन हे। अरबों-खरबों कमावत हें, तभो ले पेट उन्ना के उन्ना। सब उद्योग धंधा, बेपारी, कालाबाजारी, मुनाफाखोरी, टैक्स चोरी मं मस्त रिहिन। विधुन होके खुला बाजार मं कदाचार के कारोबार चलत रिहित हे। सब देस के उही हाल हे। अचानक कोरोना जब वोकरमन के धंधा अउ ठिकाना मं छापा मारिस तब सबके चेत हेरागे। सब के धंधा चउपट होगे हे अउ कतकोझन तो गस खाके अइसे गिरिन के परान पखेरू उडग़े।
वाह भाई कोरोना! तैं तो गजब कमाल के हस यार। अतेक दिन ले तैं कहां रेहे अउ का करत रेहे? ये दू कोड़ी के आतंकवादीमन कभु ये देस तब कभु वो देस के नेतामन ल धमकी देके रंगदारी वसूलत रिहिन हें, का ऐला तैं नइ जानत रेहे। अब तैं आय हस तब सबके धंधा बंद होगे। कोनो दिखबे नइ करत हे, न काहत हे के मैं आतंकवादी हौं। कोनो ल मरना हे का, अब तोर आघू मं आके। माने ले परही, तोर असन आतंकवादी अब तक न हो हे, न होवय तइसे लागथे। तोर धमकी मं मोटर, रेलगाड़ीमन ला कोन काहय, हवाई जहाज तक ह बंद होगे हे। अइसन हमर सुरता मं कोन काहय बाप-दादा के पाहरो मं नइ होय रिहिस तइसन होगे हे रे भई।
सब देस तोला कइसे अतेक डररागे, अइसे तो नइये के तैं काल अउ महाकाल बन के उतरे हस। सब देस बड़े-बड़े ब्रम्हास्त्र बनाके रखे रिहिन हे, फेर तोर वायरस हथियार के आघू मं सब फेल हे। 'सोनार के सौ घौं तब लोहार के एक घौंÓ, कस वायरस। जब ले तैं आय हस, लाखों मनखे ल भख डरे हस। कतको के लास सरत परे हे, कतको अस्पताल मं जिनगी अउ मौत ले जूझत हें। कोन हस तैं, खुल के बतावत काबर नइ हस? महामारी के आड़ मं मोला लगथे तैं जरूर महाकाल हस।
तोर नांव सुनके सब देस के सरकार के होस गायब होगे हे, सिट्टी-पिट्टी बंद होगे हे। सब लॉकडाउन मं कैद होगे हें। ये नेता, मंतरीमन घला मलई खा-खा के भोगा गे रिहिन हे। रपोटो-रपोटो करत रिहिन हे। दुनिया के सबले बड़े सिकंदर समझत रिहिन हें। जब ले तैं आय हस, जनतामन बर खजाना खोल दे हे। किसान, मजदूर, बेपारी, कर्मचारीमन ल सुविधा बांटे ले धरे हें। अतेक दिन ले आंखी मुंदाय रिहिस हे, रेवड़ी असन बांटत रिहिन। कुछु होय कोरोना, फेर एक काम तैं बने करे। तोर आय ले जिंदगी ह नवा सिरा ले पटरी म आय ले धर ले हे। गांव के पानी जौंन खतकुरहा होय ल धर ले रिहिस हे, पिये के लइक होये ले धर ले हे। आबहवा,जौंन परदूसित होवत जात रिहिस, तेमा मनखे तो मनखे अपन चिरई-चिरगुनमन खुले हवा मं सांस ले-बर धर ले हे। जंगल जौन उजरत रिहिस हे, थिरक गे हे। गंगा-जमना के पानी घला फरियरहोय ले धर ले हे।
आज मनखे चेते नइये। कोरोना ये नेतामन ला थोकन अउ बने दंदौर। पूरा बेवस्था ला इहीमन बिगाड़ के रखे हें। इकरोमन कोती झांक तो भला, एक ले बढ़के दुरयोधन, दुसासन, सकुनि भरे परे हें। मुंह म राम जपत रहिथे, फेर बगल मं छुरी धर के रेंगथें। कुछ किरपा देखा ये ढोंगी, पाखंडीमन ऊपर। अइस कर दर-दर भटकत मजदूरमन के दरद का होथे उहूमन जानंय, समझंय। भूख का होथे, वोकर मरम ल जानंय। भासन अउ परवचन के आड़ म भोली-भाली जनता रूपी सीता के अपहरन करइया ये रावनमन के घला तो खबर ले, ऐकरोमन के नसा तो एक घौं उतरय।

Gulal Verma Desk
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