का जजमान के जय होही?

बिचार

By: Gulal Verma

Published: 07 Sep 2020, 03:05 PM IST

हमर दान-धरम अउ मान-मनौती के आदत-बेवहार ह छत्तीसगढिय़ा के पहिचान बन गे हे। इही बेवहार के सेति सबके बनउकी बनत हे अउ सबके भलई होवत हे। केहे तको गे हे के- 'परहित सरस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अधमाई।Ó इहां कस धरमात्मा चोला कहूं खोजे नइ मिलय। हमर सोच-बेवहार, आदत-बिचार, मान-धरम सबो अपन जगा म ठीक हे। फेर, बिसवास, अति बिसवास अउ अंधबिसवास ल जांचे-परखे अउ समझे के जरूरत आज सबले जादा हे। माने जानबा हो। जानन, तभे मानन। ्रनइते, धोखा होही।
अब समे अइसे आगे हे के जुन्ना पहिचान ल लुकाके नवा पहिचान बनाय बर परही। हम गउ कस सरू का होयेन, सब हमला खेदे-हकाले लगिन। हम इहेंच के रहबासी होके टेसन म गाड़ी खोजथन, भुलाथन, आने डब्बा, आने गाड़ी, आने-ताने हो जथन। अनजाने आदत के सेति सबो गड़बड़ाथे। इही कमजोरी ल दूसरमन जान के फायदा उठावत हें। त का करे जाए? अपन कमजोरी ल पहिली जाने जाए।
नरसिंगनाथ जाय बर होथे, त उहां देखथन का के बेंदरामन झूम के देखइया ऊपर झपटे पड़थे। त पहिली ले सब चेतलहगा अपन-अपन सामान के रखवारी म हुसियार हो जथे। बस, अइसने हुसियारी, सावधानी के जरूरत हे। अब कहइया-लिखइयामन कइहीं के ऐमा का बात हे। अइसने बिसय म हमन ल लिखे बर चाही के कोनो ल बने रद्दा मिल जाए। कर भला, तो हो भला। माने जानकारी ही बचाव ए। नइ त झपटाव-छिनावा। हमन गुनथन के भल करके हम नेकी करत हन। अउ, ठगमन इही नेकी के रेकी करत हें। फेर, सूनसान देख के झपट-पुदक के भागे परत हें। त डरराय बर नइये, डर ले लड़े बर हे। काकर संग लड़े बर हे? अपन सोच से।
ठगे-ठगाए के खबर रोज छपत हे। तभो ले रोज लोगन ठगावत हे। छोड़ दे, जावन दे, दे-दे, घुच दे, अइसने सब समझ-समझ के फेर ल जाने-समझे के जरूरत हे। अपन गियान, अपन संगति, अपन बिचार ल समझे-समझाय ल परही। दूसर जगा के मनखे इहां आके काम-बूता, धंधा-पानी करके आगू बढ़त हे। इहां के चमक-दमक, रोजगार, सड़क, मकान-दुकान, खेती-किसानी, साग-भाजी, फल-फलिहारीमन ल देख के आगू बढ़े के सपना देखथें। अउ, इहां के मनखेमन ये सब ल छोड़ के दूसर कोती कमाय-खाय बर जावत हें। हमर धरती म दूसरमन हमन ल खिखोवत हें- अइसे करे बर चाही, वोइसे करे बर चाही। फेर, हमन कहां, कतका समझ पावत हंन।

Gulal Verma Desk
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