मानक छत्तीसगढ़ी के बेरा आ गे

बिचार

By: Gulal Verma

Published: 16 Sep 2020, 04:59 PM IST

आज ले चालीस-पैंतालिस बछर पहिली डॉ. नरेंद्र देव वर्मा ह मानक छत्तीसगढ़ी के जरूरत बताय रहिन, फेर ओकर स्तर के समझ वाला छत्तीसगढ़ी प्रेमीमन के निच्चट अकाल रहिस ते पाय के ये मामला ह जादा आगू नइ बढि़स। आज कहुं डॉ. नरेंद्र देव वर्मा रहितिन त छत्तीसगढ़ी ह कब के भाखा के दर्जा पा गे रतिस।
छ त्तीसगढ़ी भाखा के शुभचिंतकमन बर एकर से बड़े खुशी के बात अउ का होही कि छत्तीसगढ़ के बिधासभा ह एकमत होके ओला भाखा के राजकीय दर्जा देवाय बर संकल्प पास करिस हे। असल मं ठेठ छत्तीसगढिय़ा मुख्यमंत्री होय के कारन भूपेश बघेल ह महतारी भाखा के मान बढ़ाय के जोहारुक उदिम करे हे।
एकर पहिली घलो अइसने किसिम के उदिम हो चुके हे, फेर एकर बर पागा बांध के अउ तोलगी खोंस के जेन जोर देना चाही तेन हो नइ पाईस। ये बूता ला जिए मरे के सवाल बनाय ले पूरा हो पाही। जेन मन अपन भाखा ला संविधान के अनुच्छेद 8 के तहत भाखा बनाय मं सफल होइन हें, उंकर भिड़ई ला देखे ले पता चलही कि कतका जोर लगाना परथे। छत्तीसगढ़ के सबो बिधायक अउ मंत्रीमन पैलगी करे के लाइक हे जेन ये दरी पोठ खोभियाय हें। एक काम अउ इही बखत जरूरी हे।
गियानिक अउ सरलग बउरइहामन के सहयोग ले के छत्तीसगढ़ी के मानकीकरण के उदिम चलातिन। अइसे तो येहर जबड़ बूता आय, फेर लिखे मं एकरुपता के 'गाइड-लाइनÓ बनाये जा सकत हे। ये काम नइ होय पाही त कल काला लजाय बर पर सकत हे। असल मं छत्तीसगढ़ी मं लिखई-पढ़ई ह उत्ताधुर्रा चलत हे। साहित्य सिरजन के चारोंकाल ह एकउहा अकन ले चलत हे, जेकर कारन से एक किसिम के 'अराजकताÓ बगर गे हवय।
जेन जइसे पात हे तइसे लिखत हे। ये बात तो तय हे कि 'चार कोरा मं पानी बदलय, बीस कोस मं बानीÓ ते पाय के जघा-जघा के भाखा मं थोर-थोर फरक हे। बोले मं कुछु फरक नइ परय फेर लिखे मं एकरुपता आना चाही। अब एकठन आखर ला देखव 'अउÓ। कोनो 'अउÓ लिखथे कोनो 'अऊÓ लिखथे कोनो 'अउरÓ लिखथे। अब दूसर भाखा के मनखे पढ़ही त का समझहीं? ये काम ह कोनो 'भाषाविदÓ के बस के बात नोहय। भाखा के झंडा धरइया अउ आंदोलन करइया घलो ये मामला मं थथमरा जाही।
नवा-नवा छत्तीसगढ़ी लिखइया अउ नारा लगइया घलो ये दिसा मं कुछु नइ कर पाही। एकर बर तो चालीस-पचास बछर ले सरलग लिखइया अउ छत्तीसगढ़ के कई जघा रहइया ह कुछु बने कर सकत हे। फेर, मैं देखत हंव कि हिन्दी के लेखकमन जेन छत्तीसगढ़ी मं 'कैरियरÓ देख के अचानचकरी झपा परे हें, उन जादा उतफुलात हें। छत्तीसगढ़ी मं जेकर लम्बा लेखन, चिंतन अउ पकड़ हो ओला 'डहर बतइयाÓ बना के टिकाऊ काम किए जा सकत हे। अउ कुछु नहीं, सिरिफ लेखन मं एकरुपता आ जाय त भाखा के दर्जा ह गरब करे के लाइक बन सकत हे। छत्तीसगढ़ी एक पोठ भाखा आय, येमां आखर भंडार अड़बड़ बड़े हे।
कहानीकार डा. पालेश्वर शर्मा ह छत्तीसगढ़ी खेती-किसानी के आखर ऊपर पीएचडी करे हे, अब सोचव कि कतक कन आखर उन ठुलियाय होही। अइसने डा. बिहारीलाल साहू ह छत्तीसगढ़ी के पहेली मन ऊपर पीएचडी करे हे। अपन थिसिस मं उन ग्यारा सौ ले आगर पहेली सकेले हें। छत्तीसगढ़ी अतेक उदार भाखा हे कि प्रांत के तीर तिखार के भाखा मन संग मिल के नवा भाखा बना डारे हे। सरगुजिया, लरिया, गोंड़ी, माडिय़ा, खल्टाही, मुरिया, उरांव, खैरबारी, कुरूकू जइसे भाखा मन कहीं न कहीं छत्तीसगढ़ी से जुड़े हें। ये पाय के आखर मन मं थोर-मोर फरक तो परबे करही। जइसे हिन्दी के 'भीÓ बर छत्तीसगढ़ी मं घलो हे, कोनो कोति 'घलोकÓ कथें त कोनो कोति 'घोलेÓ कथें अउ एक जघा तो 'घलावÓ कथें। बोले म तो ठीक हे, फेर लिखे म एकरुपता चाही।

Gulal Verma Desk
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