मरना तो खच्चित हे, तभो ले अमर रहे के सोचथे

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Published: 22 Sep 2020, 04:36 PM IST

असल म जब भगवान ह मनखे ल बनाइस त पहिली वोहा एक 'रोबोटÓ कस रिहिस। सबो काम ल भगवान ले पूछ के करय। धीरे-धीरे मनखे के दिमाग अइसे खराब होगे के वोहा अपन फइसला करे बर छोड़ दिस। मनखे के अइसन करनी ल देख के भगवान घलो ह असकटागे अउ वोहा मनखे के 'मनÓ बना दिस। मन बनचेत मनखे ह सुवारथी, लालची, परेमी, साहसी ... सब बन गे।
मनखे के मन ह किसम-किसम से सोचे लगिस। जेन मन म आवत हे तउन पूरा होय बर चाही। चाहे ऐकर बर कुछु भी उदिम करे बर परय। अइसने एकझन कुंवारा टूरा ह चार बछर ले उलटा लटक के भगवान के तपस्यिा करिस। भगवान खुस होके कहिस- मांग का मांगे बर हे? वोहा कहिस- भगवान मोर बिहाव सबसे सुग्घर हीरोइन से करा दे। भगवान ह मंगनी करा दिस। कुंवारा फेर उलटा लटक गे। भगवान बोलिस, अब का इच्छा हे? वोहा कहिस- दहेज म हीरोइन के संग वोकर बहिनी घलो मिले बर चाही। भगवान ह गुस्सा के कहिस - मुरख, तेहा कुंवारेच मर। इही हाल मनखे के 'दिलÓ के हे। कभु भरबेच नइ करय।
बहुतेच जुन्ना समे ले मनखे के इच्छा रहिस हे कि वोहा अमर रहय। तेकर सेती कभु वोहा जादूगरमन से टोटका करावय, कभु देवतामन से बरदान मांगय, कभु बइद, बइगा-गुनियामन से दवई लेवय। अतेक उदिम करे के बाद घलो एक दिन अइसे आथे वोहा अपन घर-दुवार, जमीन-जायदाद, लोग-लइका, परिवार-समाज सब ल छोड़ के ये दुनिया ले चल देथे।
जब नगाड़ा बजावत 'कालÓ ह आथे, तब बड़े-बड़े सुरमामन के सिट्टी-पिट्टी गुम हो जथे अउ जर, जोरू अउ जमीन (पइसा-कउड़ी, सुवारी अउ खेती-बारी, घर-मकान) ल छोड़ के एक दिन मरेच बर परथे। मउत ले बढ़के दुनिया म अउ दूसर सच नइये। तभो ले मनखे ह जिंदा रहे बर किसम-किसम के उदिम करतेच रहिथे। मनखे ह मउत ल तो नइ जीत सकय त फेर इतिहास म जिंदा रहे के उदिम करथें। इतिहास म अइसे कतकोन मनखे मिल जथें, जेकरमन के ऊटपुटांग काम ल आजो सुरता करे जाथे। तुगलक नाव के राजा ह तो चमड़ा के पइसा चलाय रहिस।
दुनिया म किसम-किसम के लोगन हें, अउ वोकरमन के कतकोन आदत-बेवहार। सच्ची सलाह देवइया घलो हें, त बिन मांगे उल्टा-सुल्टा सलाह देवइया घलो हें। एकझन कहिस- संगवारी मोर लइका के पढ़ई म मन नइ लगय, न कोनो काम-धंधा करय। नानपन ले दूसर के जिनिसमन म हक जताथे। अइसे सफई से लबारी मारथे, सहिच लगथे। अपन गलती नइ मानय। दूसरे के गलती निकालत रहिथे। कुछु कहिदेबे त दू-तीन दिन ले खाय-पीये बर छोड़ देथे। अपन बात मनवा के रहिथे। वोकर बात ल काटत वोकर संगी ह सलाह दिस- तोर किसमत खुल गे। तोर लइका ह तो भगवान के उपहार हे। तेहा वोला पहिचानबेच नइ करे। तोर लइका ह आगू जाके बड़का 'नेताÓ बनही। अब वोकर खुसी के ठिकाना नइ रिहिस। तेहा सहिच कहेस संगवारी कहत वोहा घर डहर दउड़ परिस।
जब दुनिया म जेन आए हे, तेन ले एक दिन जाय बर परथे। तभो ले मनखे अमर रहे के सोचथे। लालच करथे, सुवारथी बनथे, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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