लचहा मनखे अउ कोरोना

गोठ के तीर

By: Gulal Verma

Published: 30 Sep 2020, 04:38 PM IST

कोरोना वायरस के डर ह आजकल गरीब, धनवान, लइका, सियान अउ दुनिया जहान ल अपन कांख म अइसे चपक के बइठे हे, जइसे बाली ह रावन ल अपन कांख म चपक ले रिहिस। जम्मो मनखे सुतत-सुतत, जागत, खावत-पियत खाली कोरोना के गोठ गोठियावत हें। अइसन बिकट बेरा म काली रात के लटपट मोर नींद ह परे रहिस। तभे अड़बड झन के हंसई- कुदई के हल्ला-गुल्ला ल सुनके मोर नींद ह टूटगे। मेहा आंखी-कान ल रमजत गुने लागेंव कि कोरोना के डर ल भूला के अतेक रात के कोनमन हंसी खेलवाड़ म लगे हवंय।
कोनमन हंसी-ठठ्ठा करत होहीं सोचत-सोचत मेहा खटिया ले उठेंव। हाथ म कुबरी, टारच धर के वो डहर गेंव, जेती ले हांसी के अवाज आत रिहिस। वो मेरन पहुंचत-पहुंचत देखेंव कि अड़बड़ अकन कोरोना वायरसमन जुरे रिहिन। अउ गोठ बात करत अइसे माते रिहिन जानो-मानो ककरो मांदी भात खाये मनखेमन सकलाय रहिथें। मेहा वोमन के गोठ-बात ल सुने बर डरावत कांपत थोरकिन अउ वोकरमन के तीर म पहुंचेव अउ उही मेरन जागे इकठिन बड़े भारी बर के रूख के पाछू म लुका गेंव।
मेहा देखेंव-सुनेव कि एकझन वायरस ह मेछा ल अइठंत बोलिस- आजकल हमर कोरोना खानदान के नगाड़ा दुनियाभर म बाजत हावय। जेती देखबे तेती हाहाकार मचे हावय। मोटरगाड़ी म फरर-फरर भगइया मनखे ह घुघवा कस घर म खुसरेे-बइठे हे। अउ हमन ल गारी देवत अंगरी फोरत कोसत हे कि कब मरही ए कुकरमी कोरोना ह।
दूसर वायरस ह बोलिस- हमन ल कुकरमी कहइया मनखे अपने कुकरम के पाप ल भोगत हे। धरती मइया ह मनखेमन ल सब्बो जिनिस दिस हावय। अनाज के एकठिन बीजा ल भुइंया म बोथें त धरती मइया ह वोकर बदला म कइ गुना जादा अनाज मनखे के कोरा म बरदान कस डार देथे। तभो ले ललचहा मनखे के मुंहु ह सूरसा राकछसनी कस बाढ़त जावत हे। इही लालच म बुड़े-बुड़े मनखे के सुमति ह कुमति म बदल गे हवय। अउ रूख-राई, नदिया-तरिया, खेत-खलिहान, चिरई-चिरगुन सबके बिनास करत मनखे आज किसिम- किसिम के रोग बीमारी म फंस के अपनेच जीव के काल बनगे हवंय। हां भई तोर गोठ ह सोला आना सही आय। अइसन हुंकारू भरत एकझन दूसर वायरस ह बोलिस- भुइंया के जीव जगत के ऊपर अनाचार करत-करत मनखे भूला गे हे कि दुनिया के जम्मो जीव-जंतु एक-दूसर बर सहारा होथे। ये बात ल गुनना छोड़ के मनखेमन भुइंया म अतेक अनाचार मचावत हें कि खुदे मनखे के जिनगी बर संजीवनी कस काम करइया जिनिस नदावत जावत हें। इही पाय के हमर कस नवा-नवा वायरस उपजत बाढ़त हावंय। अउ महामारी के गरेर म मनखे जात ह फंसत मरत जावत हे।
तभे उही मेर बइठे एकठिन बुढ़वा वायरस ह खांसत -खखारत बोलिस- दुनियाभर म कोरोना महामारी ले जूझत डॉक्टर, पुलिस अउ बिजली वालामन अपन जान ल जोखिम म डार के खुद के घर-परिवार ल छोड़ के दूसरमन के सेवा म रात-दिन लगे हवय। अइसन बेरा म सियान अउ सरकार ह कोरोना के छूत ले बांचे बर जनमन ल बतावत हे कि घर ले बाहिर झन निकलव। काबर कि किराय कुकुर कस कोरोना वायरस ह बाहिर म किंजरत हे। अउ मउका के ताक म हे कि कोनो मनखे बाहिर निकलही त खखवाय कुकुर कस वोला हबक लेबो। फेर, कतकोझन मुरूख मनखेमन सियानमन के सलाह ल माने बर छोड़ के टेस मारत सान बघारत घर ले बाहिर निकलत हें। मास्क नइ लगावत हें। एक-दूसर ले दूरिहा नइ रहत हें। भीड़ लगाय बर नइ छोड़त हें। अइसने हे मुरूखमन के आंखी खोले बर इही कहना सही होही कि काबर इतरावत हव अपन ठाट-बाट म खाली रही हाथ ह जब तुम जाहू घाट म।
वाह, वाह कतेक सुग्घर बात केहे ***** संगवारी कहत एकझन अउ डोकरा कस वायरस ह बोलिस-लॉकडाउन म ललचाहा मनखेमन अपन घर म चाउर -दार, नून-तेल, साग.-भाजी ल तको ठूंस-ठूंस के भरत हवंय। ये बेरा म रोज कमइया, रोज खवइया गरीबामन के पीरा ल तको वोमन बिसार देवंत हे। मोला तो अइसने ललचाहा मनखेमन बर एकठिन किस्सा सुरता आवत हे। जम्मोझन धियान देके सुनव।
कोनो गांव के एकठिन किसान ह बइला गाड़ी म चाउर के बोरा भर के जावत रिहिस, तभे एक बोरी ह गाड़ी के पीछू कोती ले गिर के चिरागिस। जेकर ले थोरकिन चाउर ह उही मेर बगर गे। उही बेरा म एकठिन चिरई, चिटरा अउ गाय ह वो मेरन ले नाहकत-नाहकत अपन पेटभर चाउर ल खा-खा के चल दीन। इंकर पाछू एकझिन मनखे ह उही मेरन नाहकत चाउर के बोरी ल देखिस। त एक पल गवांय बिना वोहा पूरा के पूरा बोरी ल उठाके लकर-धकर अपन घर कोति चल दिस। ये कथा ह बतावत हे कि छोटे-छोटे जीव-जंतुमन तको अपन पेट ल छोड़ के दूसर के भुख पीरा के तको सुरता राखथें। फेर, मनखे अइसे जीव आय जउन ह जिनगीभर दूसर के हक ल मारत अपन घर भरे म तको नइ चूकय। मनखे के अइसने ललचहा लार ह वोला महामारी के दुवार म आज खड़े कर दे हावंय।
हां कका बने कहत हस। समे रहत मनखे ल अपन अचार, बिचार ल सुधार लेय बर चाही। नइते अवइया बेरा म हमरो ले जादा बड़े-बड़े वायरसमन मनखे ल गिधवा कस चीथे खाय बर नजर गड़ाय बइठे हें। अतका कहत-कहत वो वायरस ह पीछू कोती पलटीस त वोकर नजर ह मोर ऊपर परगिस। मोला देखते साथ वोहा दउड़ो-दउड़ो, पकड़ो-पकड़ो कहत मोर कोती भागत आइस। वोकर संगे-संग अड़बड़ अकन वायरसमन तको मोला झपटे बर दौड़े लागिस। वोमन ल अपन कोती आवत देख के मोर पोटा सुखागे। मेहा आंखी कान मूंद के सरपट अपन घर कोती भागे लागेंव। भागत-भागत एकठिन बड़े जानी डबरा म धड़ाम ले गिर गेंवअउ जोर जोर से गोहार पारत बोलेंव. बचाव बचाव...।
तभे मोर घर गोसाइन ह मोला झकझोरत बोलिस. का होगे जी? मोला समझ म आगिस के मेहा सपना देखत रहेंव। मेहा जम्मो भाई-बहिनी ले बिनती करत हंव कि अपन-अपन घर ले बाहिर झन निकलहू। तभे कोरोना वायरस ह कोना ल अपन लपेटा म नइ लिही। खुदे अपन मूड ल पटक-पटक के मर जाही। इही म जम्मोझन के भलई हे।

Gulal Verma Desk
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