संघर्स ले उपजे जनकवि कोदूराम दलित

सुरता म

By: Gulal Verma

Published: 30 Sep 2020, 04:58 PM IST

छत्तीसगढ़ के गिरधर कविराय के नाव ले मसहूर जनकवि कोदूराम 'दलितÓ के जन्म 5 मार्च 1910 के गांव टिकरी (अर्जुन्दा) जिला दुरुग के साधारन किसान परिवार म होय रिहिस। किसान परिवार म पालन पोसन होय के सेती पूरा बचपन किसान अउ बनिहार के बीच म बीतिस। अजादी के पहिली अउ बाद उन कालजयी सृजन करिन। समतावादी विचार, मानवतावादी नजर अउ यथार्थवादी सोच के सेती आज पर्यन्त उन प्रासंगिक बने हवय।
दलितजी के कृतित्व म खेती-किसानी के अद्भुत चित्रन मिलथे।
पाकिस धान अजान, भेजरी, गुरमटिया,
बैकोनी, कारी-बरई बुढिय़ा बांको, लुचाई, श्याम-सलोनी।
धान के डोली पींयर-पींयर, दीखय जइसे सोना। वो जग-पालनहार बिछाइस, ये सुनहरा बिछौना।
दुलहिन धान लजाय मनेमन, गूनय मुड़ी नवा के,आही हंसिया- राजा मोला लेगही आज बिहा के।
सुतंत्रता आंदोलन के बेरा लिखे उंकर प्रेरनादायी छन्द।
अपन देश आजाद करे बर, चलो जेल संगवारी, कतको झिन मन चल देइन, आइस अब हमरो बारी।
गांधीजी के विचारधारा ले प्रभावित होके अंगरेजी हुकूमत के खिलाफ साहित्य ल अपन हथियार बनाइन। सिक्छक रहिन तभो ले लइकामन के मन म सुतंत्रता के अलख जगाय खातिर राउत दोहा लिख-लिख के प्रेरित करिन।
हमर तिरंगा झंडा भैया, फरावैै असमान। येकर शान रखे खातिर हम, देबो अपन परान।
दलितजी के रचना मन कबीर के काफी नजदीक मिलथे। जइसन फक्कड़ अउ निडर कबीर रहिन, वइसने कोदूराम दलितजी। समाज म फइले पाखंड के उन जमके बिरोध करिन। एक कुंडलिया देखव।
ढोंगी मन माला जपैं, लम्हा तिलक लगायं। हरिजन ला छीययं नहीं, चिंगरी मछरी खायं। चिंगरी मछरी खायं, दलित मन ला दुत्कारैं। कुकुर, बिलाई ला चूमयं, चाटयं पुचकारैं। छोड़-छांड़ के गांधी के, सुग्घर रसदा ला। भेद-भाव पनपाय, जपयं ढोंगी मन माला।
कोदूराम 'दलितÓ ला जनकवि कहे के पाछू खास वजह ये भी हवय कि उंकर रचना म आम जनता के पीरा हे, आंसू हे, समस्या हे। उंकर कविता सुने के बाद आम अउ खास दूनों मनखे प्रभावित होय बिना नइ रह सकिस। उंकर कविता लोगनमन ल मुंह जुबानी सुरता रहय। उंकर रचना समाज म फइले बुराई ऊपर सीधा चोट करय। छत्तीसगढिय़ा के पीरा ल दलितजी अपन जीवनकाल म उकेरिन जेन आजो प्रासंगिक हवय। उंकर लिखे एक एक सब्द छत्तीसगढिय़ा मनखे के हक के बात करथे।
छत्तीसगढ़ पैदा करय, अड़बड़ चांउर दार। हवय लोग मन इहां के, सिधवा अउ उदार। सिधवा अउ उदार, हवयं दिन -रात कमावयं। दे दूसर ला भात, अपन मन बासी खावयं। ठगथयं बपुरा मन ला, बंचकमन अड़बड़। पिछड़े हवय अतेक, इही करन छत्तीसगढ़।
दलितजी 28 सितम्बर 1967 के नस्वर देह ल त्याग के परमात्मा म विलीन होगिन।

Gulal Verma Desk
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