दुनिया बदल गे, फेर दुनियादारी ह नइ बदलिस!

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Published: 30 Sep 2020, 05:07 PM IST

एक होथे बदला लेहूं, अउ एक होथे बदल देहूं। एकठिन बिग्यिापन आथे, सब ल बदल दूहूं। कतकोनझनमन कहिथें- सब बदल गे गा। दुनिया पहिली जइसे नइ रिहिस। घर, परिवार, गांव, समाज बदल गे। नइ बदले हे तेमन बदलत हें। जेमन बदलबेच नइ करिस, वोमन इतिहास बन गे। वोमन ल देखनी होगे। फेर, कतकोनझन मनखे अइसे कहइया घलो हें - 'कुछु ह तो नइ बदले हे।Ó
अइसने दुनिया म एक ले सेक राजा, महाराजा, सासक, नेता, राजनीतिग्य, इतिहासकार होय हें। बुड़ती डहर (पस्चिमी देस) के एकझन राजनीतिसास्त्री रिहिस। वोहा सत्ता पाय के तरीका बताय रिहिस। वोहा कहे रिहिस- कुरसी पाय, सत्ता हथियाय बर हरदफे बियाकुल रहव, बिलई ताके मुसवा कस मौका देखत रहव अउ आम मनखे के हित से जुड़े रहव।
अइसने सत्ता ल लेके दुनिया म एक ले सेक नाटक, कहिनी, कविता, गीत लिखे गे हावय। एकठिन नाटक म नेता ह कहिथे- राजनीति के पहिली उसूल हे के आम जनता ल ***** बनावत रहव। आज दुनियाभर म अइसे दिखई देथे। हमर देस म घलो कतकोन बछर ले अइसने चलत आवत हे। बिसवास नइ होवत हे त राजनीतिक दल अउ वोकर नेतामन के करे वादा-दावा ल सुरता करव। सुरता नइ आवत हे त 'सोसल मीडियाÓ कब काम आही! इंटरनेट म जम्मो भासन-वासन, वादा-दावा मिल जही।
आपमन देख लव न गरीबी मिटिस, न बिदेस ले करियाधन आइस, न पेटरोल सस्ता होइस, न नारीमन ल सुरक्छा मिलिस। बेरोजगारमन ल काम घलो नइ मिलिस। कुछु तो नइ बदले हे। सब ह वोइसने के वोइसने तो हावय। उही महंगई, उही भरस्टाचार, उही करियाधन, उही बेकारी।
मनखे के दिल रीता कुआं नइ, बल्कि रीता समुंदर हे। कुआं तो एक पइत भर सकत हे, फेर समुंदर के भरई ह मुसकुल हे। काबर के जतेक पानी समुंदर म जाथे, वोतके पानी उडिय़ा जथे। इही हाल मनखे के दिल के हे। वोकर इच्छा के कोनो ओर-छोर नइये। भगवान बुद्ध ह इही ल तरिस्ना कहे हे। तरिस्ना कभु मिटबेच नइ करय। चाहे वोहा पइसा-कउड़ी, जमीन-जाइजाद के होवय या फेर कुरसी-सत्ता के।
पहिली राक्छसमन देवतामन के राज-पाठ छिने बर चढ़ई करंय। फेर, राजा-महाराजामन एक-दूसर के राज-पाठ ल हड़पे बर लड़ई करंय। अब के समे म नेता, अधिकारी, करमचारी, बेपारी, ठेकेदार, उद्योगपति, बड़हर, गौंटिया, मंडलमन 'दिन दूनी- रात चौगुनीÓ कमावत हें, तभे ले वोकरमन के 'कुआंÓ ह नइ भरत हे।
लालची, उपद्रवी, उत्पाती, सैतान मनखे पहिली जमाना म घलो रिहिन अउ अब के जमाना म घलो हें। अइसन मनखेमन न पहिली बदलीन अउ न अब बदलत हें। अपन सुख बर दूसर ल दुख देय के करम जुग-जुग ले चले आवत हे।
जब सत्ता म हे तेमन कुरसी छोड़े बर नइ चाहंय। पांच बछर, पांच बछर करत कतकोन बछर ले राज करत रहिथें, तभो ले वोकरमन के पेट नइ भरंय। साहेबमन के हाथ म बहुत ताकत होथे, तभो ले वोमन ल अउ ताकत चाही। ऐकरमन के बीच म गरीब मनखे फंसे रहिथे। ये हालत बदलत नइ दिखत हे, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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