हमर देस म रोज्जेच लूटत हावय नारी-परानी के अस्मत

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Updated: 19 Oct 2020, 05:07 PM IST

'अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली, तेरे ही गुण गावें भारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती। तेरे भक्तजनों पर मैय्या भीड़ पड़ी है भारी, दानव दल पर टूट पड़ो, मां करके सिंह सवारी, सौ-सौ सिहों से भी बलशाली, दस भुजाओं वाली, दुखियों के दुखड़े निवारती, ओ मैया हम सब उतारे तेरी आरती।Ó
पता नइ मनखेमन सभ्य समाज के संस्कार ल भुला गे हावंय या फेर अपन पुरखा जानवरमन के गुन ल अपनाय बर धर ले हावंय। दुराचारीमन ल अतको खिलाय नइये कि हमर भारतीय संस्करीति, संस्कार, वेद-पुरान, धारमिक ग्रंथ, साधु-संत, रिसि-मुनिमन नारी ल 'देवीÓ कहे हें। सक्ति के देवी दुरगा, गियान के देवी सरसती, धन के देवी लछमी अउ न जाने कतकोन देवी बताय हें। एक पइत दिमाग लगाके बिचार करंय, देवी मइयामन ल दिल से सुरता करंय त छनभर म अपन करनी उप्पर पछतावा हो जही। आज देसभर म माइलोगिनमन उप्पर रोज्जेच अब्बड़ जुरुम होवत हें। तभो ले अपराधीमन ल बचाय बर कोनो न कोनो वोकरमन के हितवा आके खड़े हो जथें। कोनो ल वोट के चिंता हे त कोनो ल बदमानी के।
सरकारमन महिला उत्थान के नगाड़ा बजात हें। अखबार म बड़का-बड़का बिग्यापन देके नारी सुरक्छा के लम्बा-चउड़ा वादा करत हें। फेर, देसभर म कोनो जगा नारी सुरक्छित नजर नइ आवय। अरे! हासरथ म का होइस तेन ल देसभर ह देख-सुनत हे। देसभर म जगा-जगा नारी-परानी से अनाचार होवत हे। अनाचार के बाद नारीमन के हत्या घलो कर देवंत हें। छेड़छाड़ के विरोध करइयामन उप्पर हमला कर देवत हें। बड़ चिंता अउ दुख के बात हे के आज नारी ह न घर म सुरक्छित हे, न बाहिर म। सरकार ह अपराध रोके के दावा कतकोन करय, फेर सिरतोन बात ये हे कि अपराधीमन के मन ल पुलिस अउ कानून के चिटिकभर भय नइये। वोमन जानथें के गलती से खुदनखास्ता पकड़ा गें त कानून म छेदा के चलत बच निकलहीं।
देवतामन के भुइंया भारत देस म नारीमन उप्पर अतिचार, अनाचार खूब होवत हें। अइसन कोन करत हे? का मनखे ल अपन बनमानूस होय के सुरता आ गे हावय? बहुचेत सोचे के बाद घलो ऐ समझ नइ आवत हे के जानवर ह मनखे बनत हे के, मनखे ह जानवर। अब तक जानवर के मनखे बने के बात म दुविधा रहिस, फेर धरम-करम के मनमाने मनइया देस म नारीमन के होवत दुरदसा ल देख-सुन के लागथे जानवरेच ह मनखे बने हे, तभे अपन गुन ल नइ भुलावत हें। कहिथें के रंग-रूप भले बदल जाए, फेर जानवर के बेवहार कभु नइ बदलय! पुरुस परधान समाज म नारी ल पांव के भंदई समझथें।
माइलोगिनमन के सम्मान से होवइया खिलवाड़ ल रोके बर सरकार ह कानून ल कड़ा बनावत हे। अलग अदालत घलो बनत हे। कभु-कभु हब ले मामला के निपटारा घलो हो जथे। फेर देस म दुराचार नइ रुकत हे। अब पास्चात्य संस्करीति के परभाव ल रोके के जरूरत हे। दोसीमन ल तुरते सख्त देय बर चाही। स्कूल से लेके कालेज तक लइकामन ल चरित्र, नैतिक, अउ आध्यात्मिक सिक्छा देय के जरूरत हे। फेर अइसन नइ होवत हे, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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