गोंदली देख के झरत हे लोगनमन के आंसू

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Updated: 17 Nov 2020, 04:55 PM IST

हाय राम! मोर तो खींसा ह दुच्छा होगे साग-भाजी बिसात-बिसात। अतेक बाढ़े महंगई म साग-भाजी बिसई ह कोनो मोटर-गाड़ी, फटफटी बिसई बरोबर हांसी-ठठ्ठा के खेल नोहय भई! का गोंदली ह 5-10 रुपिया किलो म मिलत हे? चीखे बर घलो गरीब मनखे ह गोंदली नइ बिसा सकत हे। रोजेच्च साग-भाजी के कीमत ह बाढ़चेत जावत हे, फेर कोनो ह खाय बर नइ छोड़त हंन! एक हफ्ता कोनो साग-भाजी, गोंदली नइ खाय के उपास देसभर के मनखे रहि जतिन, त फेर पाके महुआ कस साग-भाजी के भाव ह टप-टप भुइंया म गिरे बर धर लेतीस!
देस के अबादी सवा सौ करोड़ ले उप्पर हे त फेर साग-भाजी ह घलो अड़बड़ होय बर चाही। फेर, हाय रे किसमत! कभु जादा पानी गिरे, बाढ़ आय ले, त कभु पानी नइ गिरे, पानी नइ पलेय के सेती साज-भाजी ल नुकसान होथे। कम जीनिस ह जादा मनखे ल कइसे पुरही! फेर दलाल, बेपारी, कोचिया अउ बेचइयामन के लालच, जमाखोरी, मुनाफाखोरी ह महंगई ल अउ बढ़ा देथे। ये समे तो कोरोना के रोना घलो चलत हे।
हमर देस के जनता ह नासमझ नइये, सब ल समझथे। वोहा खुदे सबो ल ठीक कर सकथे। महंगई ल घलो कमतिया सकथे। फेर, वोट देके नेता चुन लेथें। कहे बर अपन (जनता) सरकार बनवा देथे। तहां ले नेता ह जेन कहिदिस, सरकार ह जउन कर दिस बस उही ह 'राम बानÓ होगे। बड़ेकजनिक झोला म दू सौ रुपिया के थोरकिन साग-भाजी धरे, गोंदली ल टुकूर-टुकूर देखत मेहा सोचेंव -जनता हो! अतेकझन होके थोरकिन नेता, मंतरीमन ल वोकर जवाबदारी काबर नइ बतावव? जमाखोर, मुनाफाखोर बेपारी-दलालमन ल सबक काबर नइ सिखावव? फेर, जनता ह ये उम्मीद म महंगई ल झेलत हावंय के सरकार ह एक दिन साग-भागी ल Óटके सेरÓ बेचवाही! बेपारी-दलालमन दानी बनके मुनाफाखोरी ल छोड़ दीहीं! बेचइयामन धरमात्मा बनके साग-भाजी ल वाजिब भाव म बेचहीं!
अइसे माने जाथे के जउन सरकार ह गोंदली के भाव ल काबू म नइ कर सकय वोहा कोनो काम के नइये। अभी चुनई नइये त सरकार के आंसू घलो नइ बोहावत हे। अब जनता ल कोन ह जुवाब देवव। हालत ये होगे हावय के गोंदली ल पउले ल तो छोड़व वोला देखतेच आंखी ले आंसू टपक परथे।
गोंदली ह मोला घूरत कहिस - तेहा का सोचत हस? तोर सोचे, चिल्लाय, समझाय ले का मोर कीमत ह घट जही? नेतामन ल सिरिफ अपन सुवारथ के परे हे। जेमन कुरसी म बइठे हें तेमन कुरसी बचाय के अउ जेमन कुरसी ले उतरे हें तेमन कुरसी पाय के जतन करत हें। अजादी के बाद ले अइसनेच चलत आवत हे अउ कोन जनी कतका बछर ले चलही। सबो ल अपनेच परे हे। सुवारथ म बुड़े हें। पद अउ पइसा ह देस अउ जनता ले बड़के होगे हे, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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