साहित्य मं पिछू कोति ले खुसरे के रस्ता

गोठ के तीर

By: Gulal Verma

Updated: 23 Nov 2020, 03:41 PM IST

साहित्य बहुत साधना के इलाका ए। सरलग तप करइया, समाज हित बर जीव सुखइया अउ मरत ले धीरज धरइया के इलाका आय साहित्य। पूरा जिनगी खपा देवइया ले- देके सुरता करे के लाइक बन पाथे। राजनीति अउ समाज ला ओसरी-पारी दिसा देखइया अउ उजियारी बगरइया ह अंधियार मं कब गंवा जाथे, पता नइ चलय। क्रांतिकारी साहित्य लिखइयामन ला घलो समाज ह दू-चार बछर ले जादा सुरता नइ राखय। जिनगीभर जहर पीथे, अभाव मं जीथे अउ तियाग करत-करत परान तियागथे, उही ला समाज ह सदा दिन सुरता राखथे। फेर, आजकालि इहू मं राजनीति खुसर गे हे।
जिनगीभर तप करइया लेखक के पुरस्कार कब चरदिनियां कलम घिस्सू चोरा लेथे, तेकर पता नइ चलय। महाकाव्य लिखइया कवि के जस ला कब कोनो तुक्कड़ ह उड़ा ले जाथे, तेकर कोनो धरखन नइये अउ बड़े-बड़े पुरान लिखइया के नाम अउ जस ला कब कोनो मिठलबा माटी मं मिला देही, तेकरो कोनो हिसाब नइये। आजकालि इही चलत हे। साहित्यकार मर-मर के साहित्य लिखत हे अउ ओकर हिस्सा के इनाम ला कोनो चुटबुलाबाज टाप के ले जावत हे। साहित्यकार के नाम होथे, मान-गौन होथे, समाज मं कदर होथे ते सबला उड़ाय के रस्ता ननजतियामन निकाल डारे हें।
कविता चोर, इनाम मिडाउक अउ आत्म बिज्ञापन मं हुसियारचंदमन साहित्य मं खुसर के दहीकांदो मताय हें। पहिली डाकू घलो साहित्य मं खुसर के साधु-संत हो जावत रहिस। अब तो साधु-संत घलो डाकू लहुट जात हे। साहित्य के इलाका ह घलो 'बिन भाड़ी के अंगनाÓ हो गे हवय। जेन पात हे तिही खुसर जात हे। काबर कि येकर बर कोनो से इजाजत लेहे के नियम नइ हे। बस, नाम के आगू मं साहित्याकर/कवि/ लेखक लिख दे तहां लहुटगे साहित्यकार।
'हर्रा लगय न फिटकरी रंग चोखाÓ के सुभीता ला देख के नाना किसम के चोर, हुरपेटिया अउ बजरंगामन साहित्य मं खुसरे बर लाइन लगाय हें। येमन के करतब ला देखबे त मुंह फार देबे। बिना एकोठन कविता लिखे कवि कहलाने वालामन के भरमार हे अउ नई कविता ह तो हुंसियार मनखे ला कवि बनाय के जानो-मानो ठेका ले-ले हवय। वो मनखे कहूं मास्टर होगे, अफसर होगे अउ इहां तक कि दस्तावेज लेखक होगे त उनला कवि होय ले कोनो नइ रोक सकय।
साहित्य के घुसपैठियामन के कारनामा देखबे त अकबका जाबे। दूसर के लिखे किताब ला अपन नाम मं छपवइया तो कतको मिल जाहीं। दूसर के कविता ल चोरा के बड़का मंच मं सरेआम पढऩे वाला कविमन तो लाखों मं खेलत हें। गीता, रमायन अउ बड़े-बड़े महाकाव्य ला अनुवाद करके सरकार से अनुदान लेके छपवइयामन घलो जबड़ कवि कहलावत हें। इही हाल गद्य मं गलो संचरे हे। जेमन ला तुकबंदी के समझ नइये अउ काफिया, रदीफ, बहर के गियान नइये, तेमन सीधा 'डिक्शनरीÓ लिख डारत हें अउ साहित्यकारमन के मूंड़ मं बइठे के उदिम करत हें। ये जानके घलो कि कोनो दूसर बाल्मिकी अउ तुलसीदास पैदा नइ हो सकंय, कईझन कवि रमायन लिखे बर खोभियाय हें। न उनला दोहा के गियान हे, न चौपाई के समझ हे, न छंद के बुनावट ला जानंय। तभो ि भड़े हें।
सरकारी अनुदान भिड़ा के उन छपवा घलो डारहीं, फेर ओला पढ़ही कोन? आज के पाठक तीर नानबुटी गजल पढ़े के टेम नइये, तेहर तोर महाकाव्य ला मूंड़ मं पटक के आत्महत्या करही का? सोसल मीडिया के जमाना का आ गे, आत्मबिज्ञापन बाजमन के चांदी हो गे। उन रोज कविता पोस्ट करत हें, अपन पढ़त हे, अपने लाइक करत हें अउ अपन आप ला महान कवि घोसित करत हें। इहीमन तो सब साहित्य मं खुसरे के रस्ता आय। जेकर तीर स्मार्ट मोबाइल हे, वो बड़का कवि आय। कोनो मानय कि झन मानय। अब अपन बात ला इही मेंर घिरियावत हंव, नइतो आभासी कविमन मोला बोरे बासी नइ खावन देहीं।

Gulal Verma Desk
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