कोरोनाकाल म डरभूतहा बिहाव

समाज

By: Gulal Verma

Published: 23 Nov 2020, 03:50 PM IST

मनखे ल गजब डरहाय बर परथे। का करे जिनगी म जीये अउ घर बसाय के उदीम का-का नइ कराय। देख ना, ऐसो तो बइरी कोरोना ह डरवा डरे हे। बर-बिहाव के लइक लोगलइका बर सगा देखे के बखत म कते डाहन ले कोरोना झपा गे। जेकर मंगनी-जंचनी होगे, तेला बिहाव के फिकर। अइसन बिहाव के जेमा सगा-सोदर ल घलो नइ पूछ सकत।
मंगतू गउंटिया सोचत हे- कइसे करंव ऐती सगामन लउहात हे। सगामन ल पूछहूं त पुलिस अउ कानून के डर हे। धरमू कहिथे- देख ददा, मोर सोजहा बिहाव कर दे। नइते मंय सइकिल म जाहूं अउ तोर बहू ल लेके आहूं। कोनो मंदिर-देवाला म जयमाला बिहाव कर लेहूं। मंगतू गउंटिया कहिथे- अइसन कइसे होही बेटा, हमर कुटुंब-कबीला, पूत-परवार का कही। देख तो, गउंटिया चुपेचाप बिहाव कर डरिस, चारठन लाड़ू ल घलो नइ खवा सकिस। बेटा, बिहाव एकेच बेर होथे। तीस बछर अगोरा करे त चार महीना अउ नइ सहीं।
धरमू अपन ददा ल समझात कहिथे- देख ददा! सगा तो का, तोर गांव के कुटुंब घलो खाय बर तइयार नइये। काबर के सबके मन म कोरोना के डर समाय हे। तंय नइ जानस सरकार 'सोसल डिस्टेंसिंगÓ बना के रखे के ऐलान करे हे। भूसन मंडल ह कहिथे- दसझन बरात धर के जा अउ अपन बहू ल ले आ।
बिहाव म नइ होवत हे फालतू खरचा
ये बात सुनके गांव के सियानमन सकला गें अउ जम्मोझन कहिथें- गउंटिया! मन ल छोटे झन कर। मांदी आगू-पाछू, जब बने दिन-बादर आही तब तोर इच्छा के मुताबिक खवा लेबे। कोरोना ह बने घलो हे जी! फालतू के खरचा जेन बिहाव म होवय, वोला रोक दे हे। बाजा-गाजा, धूम-धड़ाका, अटाका-फटाका, रिसेप्सन, दान-दहेज, लाइट-टेंट ये सब देखावा भर ताय। पहिली कहां अइसन ढमढम रिहिस हे। भले ये बिहाव 'डरभूतहा बिहावÓ लागत हे। फेर, ऐहा हमर हितेसी हे जी। मन मिले बर चाही। हाथ नइ मिलाबे, समधि भेंट नइ करबोन त का होही। समधि-सजनमन तको समझहीं। त चलव, बेटा ल सजाव-संवारव। 'मन चंगा त कठौती म गंगा।Ó

Gulal Verma Desk
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