देस-समाज के हाल ल देख के हांसे बर भूला गेन

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Published: 23 Nov 2020, 04:13 PM IST

कु छ समे ले मोला कोन जनी का ऊटपुटान बीमारी धर ले हे। हरदफे एक अनजान डर लगे रहिथे। दिमाग म भय बइठ गे हे। चाहथंव के मुस्कांव, फेर ये नइ होय पाय। पहिली तो बात-बात म हंसी आवत रिहिस हे, फेर अब नइ आवय। पहिली कतकोन पइत सुने चुटकुला म घलो मुंहफार के हांस लेवत रेहेन, अब तो नवा-नवा चुटकुला, लतीफा ह घलो नइ हंसा पावय।
ये कहन कि धड़कत दिल ह बोझ कस हो गे हे। अब तो मेहा जब कोनो आठ-दस-पंदरा बछर के नोनी ल देखथंव, तब डर ह मनमाने बढ़ जथे। मन करथे, वोकर से कहंव के का करत हस बाहिर म? जा अपन महतारी के कोरा म, अंचरा म जाके लुका जा। देखत नइ अस, कइसे जहरीला सांप, बिच्छी, बड़े-बड़े दांत के जानवर तोर तीर-तखार म किंजरत हावंय। कोनो ह थोकिन घलो चाब दिही, डस लिही, काट दिही त तोर दिमाग (जेहन/मन) म चघ जही, जउन ह जिनगीभर तोर संग ल नइ छोडय़।
अब अइसे घलो नइये के हमन कभु हांसेच नइ अंन। बात-बात म जोर-जोर से हंसई हमर आदत रिहिस। हम तो वो समे घलो मस्त-मौला राहत रहेन, जब खाय बर चटनी-बासी अउ पहिरे बर एक जोड़ी कपड़ा रिहिस। गीत गावत - ('हंसते हंसते कट जाए रस्ते, जि़ंदगी यूंही चलती रहे। ख़ुशी मिले या ग़म, बदलेंगे न हम, दुनिया चाहे बदलती रहेÓ। हिंदी फिलिम 'खून भरी मांग) उही कपड़ा ल धोवन अउ सूखा के उहीच ल पहिर लेवत रेहेन। अब हमर लइकामन घलो बाड़ गे हे। तभो ले डरराथन। अब तो समाचारमन घलो डरवाय बर धर

ले हे। अब तो नेता अउ पुलिस ले घलो डर लागे बर धर ले हे। इहां तक के अब तो खुद ले (अपने-आप) ले डर लागे बर धर ले हे। कहां जावन? काकर से गोहरावन? सुनही घलो कोन? इहां काकर तीर समे हे? आपमन ल घलो अइसे लगथे?
देस, समाज म ये कइसे 'सुनामीÓ आ गे। भारतीय संस्करीति-संस्कार ल छोड़े के कइसे 'दउड़Ó सुरू हो गे। का बात ये के समाज म नैतिक पतन होवत हे। काबर दिनोदिन चरित गिरत जावत हे। जेन ल देख-सुन के सिधवा, ईमानदार, चरित्रवान, नैतिकवान, संस्कारवान मनखे डररा गे हें। ये का समे आ गे हे। नारी ल देबी मनइया भारतीय संस्करीति-समाज म नारी के सबले जादा दुरगति होवत हे।
का होगे के आज नारी ह न घर म सुरक्छित हे, न बाहिर। ये कइसे समे आ गे हे, नारी के इज्जत न परिवार म बाचत हे, न समाज म। दुनियाभर ल संस्करीति-संस्कार के उपदेस देवइया 'भारतभूमिÓ म संस्करीति बचाय के गोहार लगाय बर परत हे। का सचमुच म 'कलजुगÓ के बादर छा गे हे, जउन ह अब बरसे बर तइयार हे? आजकाल के 'हालÓ ल देख के तो ऐहा सिरतोन कस लागथे, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
और पढ़े
अगली कहानी
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned