सुरता म पारंपरिक नाचा के कलाकार

लोककला

By: Gulal Verma

Updated: 30 Dec 2020, 04:46 PM IST

दाऊ दुलारसिंह के बचपने ले गीत अउ संगीत म लगन रहिस। वोहा गांव म पांचवीं तक पढ़ई करिस तहां ले अपन धियान ल गीत-संगीत म लगा लिस। छुटपन ले तबला अउ चिकारा बजाए ल सीख गे। गांव म होवइया भजन, रमायन अउ लीलामन म दुलारसिंह बढ़-चढ़ के हिस्सा ले लागिस। बाप के बरजे के बाद घलो दुलार ह तीर-तखार म होवइया नाचा म चिकारा, तबला बजाए बर चल दय। मंदराजी दाऊ के बेटा रहिस उंकर मन मेर रवेली गांव म अड़बड़ अकन खेती-खार रिहिस। दुलारसिंह के ददा ह देखिस के बेटा के खेती-पाती कोती धियान नइये। नचई-गवई म बिधुन हे। त लइका सुधरही कहिके 14 बरिस के उमर म मंदराजी के बिहाव कर दिस। बिहाव के बाद घलो दुलारसिंह अपन नाचा के परेम ल नइ छोडि़स।
जइसे पता चलतिस के कोनो गांव म नाचा होवइया हे, दाऊ के छकड़ा गाड़ी फंदा जावय। रात-रातभर दाऊ नाचा देखय अउ समे परय त नाचा म चिकारा बजावय। वो समे रात म खड़े साज के नाचा होवय जउन म गम्मतिहामन लकड़ी के मसाल म भभका बार के अंजोर करय।
दाऊजी अपन गम्मत म हांसी-ठठ्ठा, बियंग अउ समाज के पीरा ल देखावंय। इंकर ‘मेहतरिन’ गम्मत के सोर अड़बड़ रहिस। ऐमा समाज म छाये छुआछूत अउ कट्टर बामनवाद के हांसी-बियंग म जब्बर विरोध रहिस। ‘रानी’ गम्मत म हिन्दू-मुसलमान भाईचारा अउ परेम के संदेसा रहिस। बुढ़वा अउ बालबिहाव के विरोध म घलो ऐमन ह एकठन नकल खेलय तउन ह भरपूर हांसी-बियंग संग संदेसा रहिस। इंकर इही नकल ल पाछू हबीब तनवीर ह ‘मोर नाव दमाद मोर गांव के नाव ससुरार’ नाव ले खेलिस तउन ह देस-बिदेस म अड़बड़ पसंद करे।
मसाल के जगा गैसबत्ती लाय गिस
दाऊजी ह नाचा म फिलमी परभाव ले होवत बेढग़ापन ल रोके बर अउ नाचा म छत्तीसगढ़ के पारंपरिक स्वरूप ल बचाए राखे खातिर काम करिन। दाऊ मंदराजी ह हमर पारंपरिक नाचा के बढ़ोतरी खातिर ऐमा समे के अनुसार बिकास तको करिन। खड़े साज के नाच पारटी म मसाल के जघा गैसबत्ती लवइया, चिकारा के जघा हरमोनियम अउ गोहर पार के पाठ बोलई के जघा माइक ल बउरइया दाऊ मंदराजी रहिन। महिला के पाठ करइया पुरुस कलाकार के जघा म देवरनिन टूरीमन ल नाचा म लाय के साहस तको दाऊजी मेर रहिस ।
एके गांव के नइ रहय कलाकारमन
अलग-अलग गांव के रहइया कलाकारमन मातर-मड़ई म सकलावय त रातकन नाचा रखे जाय। अभी जइसे देखे ल मिलथे तइसे नाचा कलाकारमन के संगठित पारटी नइ रिहिस। कलाकारमन अपन रोजी-रोटी कमावत अलग-अलग गांव म बगरे रहंय, तउन ल दाऊ दुलारसिंह ह
नाचा के अजर-अमर कलाकार
मदन निसाद, भुलवाराम यादव, पद्मसिरी गोविन्दराम निर्मलकर, फिदाबाई मरकाम, देवीलाल नाग, गीताबाई, ताराबाई, पद्माबाई, बासंती देवार, रायपुर के जगमोहन, दुरूग के ठाकुरराम, रायगढ़ के लाला फूलचंद सिरीवास्तव, जांजगीर के धरमलाल कस्यप, चूरामनी सरमा, राधेस्याम, बिलासपुर के सुख सागर सिंह, बालाराम अउ दूरबीनदास, जूना बिलासपुर के मंझिला महराज नाचा पारटी वाले, कमलेस्वर साहू, गिरधारी यादव, लछिमन दास।सकेलिस।

पहिली बार दाऊ मंदराजी ह रायपुर जइसे बड़े सहर म टिकट लगाके अपन रवेली रिंगनी साज के नाचा ल एक-डेढ़ महीना ले पाल-परदा सहित पेस करिन। तेकर पाछू सबे छोटे-बड़े नाच पारटीमन दाऊजी के नकल करत अपन-अपन नाचा पारटी म नवा-नवा परयोग करिंन। दाऊ मंदराजी अपन उम्मरभर नाचा के संग जीइस। उंकर खेती-खार सब परिया परगे। नइ तो नाचा के आयोजन बर होये खरचा बर बेचा गे। धीरे-धीरे दाउ मंदराजी के जम्मो जमीन बेचा गे। फेर, दाऊजी अपन नाचा के धुन ल नइ छोडिऩ।

Gulal Verma Desk
और पढ़े
हमारी वेबसाइट पर कंटेंट का प्रयोग जारी रखकर आप हमारी गोपनीयता नीति और कूकीज नीति से सहमत होते हैं।
OK
Ad Block is Banned