छत्तीसगढ़ी म नइ गोठियाय के सेती पिछवात हे छत्तीसगढ़ी!

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Published: 21 Feb 2021, 04:40 PM IST

ये बात म चिक-चिक करे के सायदे कोनो गुंजाइस होवय के, अगर हमन ल अपन महतारी भासा के मान बढ़ाय बर हे त सबले पहिली हमिचमन ल वोला मान देय बर परही। पढ़े-लिखे, नौकरीपेसा, बड़हर, गुरुजी, साहेब, करमचारी, नेता, मंतरी समेत वो सबे मनखेमन जउनमन छत्तीसगढ़ी म गोठिया-बतिया सकथें, वोमन ल छत्तीसगढ़ीच बोले बर चाही। दुख के बात हे के, अलग छत्तीसगढ़ राज बने अउ छत्तीसगढ़ी ल राजभासा बनाय के बाद घलो न छत्तीसगढ़ी माध्यम म पढ़ई-लिखई होवत हे अउ न सरकारी काम-बुता। कतकोन नेतामन तो छत्तीसगढ़ी म भासन घलो नइ देवंय।
दरअसल म ये सब काम ह तो बहुत पहिलीच हो जाय बर रहिस हे। अपन महतारी भासा म काम करई, बोलई-बतियई भर नइ, बल्किन सबो जगा (घर, परिवार, समाज, आफिस, सार्वजनिक मंच, स्कूल-कालेज, सभा, बैठक, जुलूस, रैली आदि) छत्तीसगढ़ी म बोले-बतियाय म गरब होय बर चाही।
सबो परदेस के मनखेमन अपन महतारी भासा म गोठिया-बतिया के अब्बड़ गरब महसूस करथें। फेर, कतकोन छत्तीसगढिय़ामन दूसर के आगू म गलत-सलत हिंदी म बोल के गरब म बुड़े रहिथें। अपनेच छत्तीसगढिय़ा भाईबंध, जान-पहिचान, संगी-संगवारीमन कना हिंदी झाड़थें। जात-बिरादरी, सभा-बइठक म घलो हिंदी म बोलथें।
फेर, दूसर परदेस के मनखेमन जब एक-दूसर ले मिलथें त वोमन अपनेच महतारी भासा म गोठियाथें। अपन भासा म गोठियाय म वोमन ल कभु सरम नइ लागय। दरअसल म अपन भासा म नइ बोलई ह एक किसम के छोटपन (हीनभावना) ए, जउन कतकोन पइत हमन ल सभा-बइठक, मंचमन म अपन महतारी भासा म बोले बर रोकथे।
अइसे लागथे के कुछ लोगनमन छत्तीसगढ़ी के बढ़ती म अड़ंगा डारत हें। ऐमन ल समझाय-बुझाय के जरूरत हे। छत्तीसगढ़ी ल छत्तीसगढ़ के पहिचान बनाय बर सबो के सहयोग, योगदान अउ जवाबदारी होय बर चाही। छत्तीसगढ़ी ल अपनाय के जगा जबरन थोपत हे, अइसे घलो नइ लगे बर चाही।
दरअसल म छत्तीसगढ़ी के बढ़ती खातिर अउ बहुत कुछ करे बर परही। जम्मो छत्तीसगढिय़ामन ल छत्तीसगढ़ीच म गोठिया बर चाही। छत्तीसगढ़ी माध्यम म पढ़ई-लिखई होय बर चाही। बोलचाल, साहित्य, लिखई-पढ़ई अउ सरकारी मानक छत्तीसगढ़ी के फरक ल मिटाय बर परही। छत्तीसगढ़ी ल आठवीं अनुसूची म सामिल कराय अउ सरकारी काम-बुता ल छत्तीसगढ़ी म करे बर परही। छत्तीसगढ़ी बोलइयामन ल अडग़ा, पिछड़ा, कहइयामन के बहिस्कार होय बर चाही। फेर अइसन नइ होवत हे, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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