देस के गरीब जनता ह तो ‘भगवान’ के भरोसा हे!

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Published: 01 Mar 2021, 05:20 PM IST

संगी! गरीबमन के बारे म का कहे, का बोले जाथे? इही ना कि, ‘दार-भात खावव अउ परभु के गुन गावव।’ फेर, जब गरीब के थारी ले दार गायब होय बर धर लय त...? आज महंगई के ये हाल हे कि गरीब ल तेल, दार, गोंदली तको नसीब नइ होवत हे।
सिरतोन! पेटरोल, डीजल, रसोई गैस के दामभर नइ, अब तो हमन ल कोनो जिनिस के बाढ़े भाव ले अचरज नइ होवय। काबर कि, हमन सब ‘पर भरोसा’ हन! रुपिया ह पहिलीच ले बजार के हवाले हे। सोना घलो ह बजार के कब्जा म हे। साग-भाजी मौसम के भरोसा हे। महंगाई ह जमाखोर अउ मुनाफाखोरमन के हवाले हे। जनता के हित के योजना के घोसना चुनई के हवाले रहिथे। दान-धरम ह डरे-सहमे लोगनमन के हवाले हे अउ देस ह नेता-साहेबमन (तंत्र) के हवाले हे।
संगी! ऐ सब बात ल लोगनमन ल सरग-नरक, इहलोक-परलोक के चक्कर बता के घलो समझाथें। वोमन कहिथें कि पाप झन करव, बने काम करव। ये लोक ह तो बिअरथा चल दिस, परलोक ल बना लव। जउन ये जनम म सुख, संपन्नता भोगत हावंय, वोहा पीछू जनम के परसाद आय। जउन लोकतंत्र म राजा-महराजा कस जिनगी जीयत हावंय, वोकर संपन्नता सदा बने रहय, ऐकर गुर बताय जाथे।
सिरतोन! लोकतंत्र म राजा जइसे ठाठ-बाठ से जिनगी कोन जीयत हावंय ऐहा जगजाहिर हे। जनता ह तो नेतामन के आसरे हे। चुनई के समे नेतामन वादा करथें। सत्ता पाथें तहां वादा ल भुला जथें। जनता के सेवक बने बर छोडक़े सासक बन जथे। सेवा नइ, सासन करथें। कुरसी म कोन बइठे हे, का फरक परथे। सब अपनेच देखइया हें। जनता के तो कोनो खेवनहार नइये!
संगी! खाय-पीये, रोजमररा के साधन-सुविधा के जिनिस महंगी होगे, कोनो बात नइ! हिम्मत झन हारव। सरकार कुछु नइ करत हे, कोनो मलाल नइये। जउन हिम्मत हार जही, तउन बाढ़े महंगई म जी नइ सकय। सरकार ह दू-चार दिन म बतावत रहिथें के वोहा जनता के हित बर योजना बनावत हे। तेकर सेती पांच बछर धीरज रखव। दार, तेल, अनाज, पेटरोल, डीजल जइसे समस्या ले खुदे निपट लव। सरकार ह बुलेट टे्रन, स्मार्ट सिटी जइसे योजना बनावत हे, वोकर धियान ल झन भटकाव।
सिरतोन! मांग करई, रैली निकलई, धरना-परदसन, अनसन करई जनता के हाथ म हे। फेर, मांग पूरा करई, समस्या के हल करई सरकार के हाथ म हे।
जब जनतंत्र म जनतेच ह सबले जादा परेसान, हतास हे। जनता के सेवकमन राजा-महराजा कस बेवहार करत हें। नेतामन के जुबान के कोनो भरोसा नइये। चुनई जीते बर लबारी मरई ह करम-धरम बन गे हे, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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