खेला होवत हे बिन देखइया के

गोठ के तीर

By: Gulal Verma

Updated: 19 Apr 2021, 05:06 PM IST

बड़ बिपत के दिन आय हवय संगी। चौका अउ ***** म कोनो ताली बजैया नइ हे, तभो ले धकाधक खेला होवत हे। अब का हे खेल होना जरूरी हे, नइ त खिलाड़ीमन खेले ल भुला जाही त कोन बताही। भले कोनो रहय, चाहे झन रहय। खिलाड़ी ला अउ आयोजक ला टीवी वालेमन ला बिग्यापन वालेमन ला तो पइसा मिलही ना, त फेर का जरूरत हवय ताली अउ तासा के। अइसे घलो आजकल बिग्यान के जमाना म अपनेआप चौका मा ताली के आवाज बाजे लगथे। देखइयामन घर म खुसरे-खुसरे फोकट म खेला देख-देख के मोटात हें। नइ जी, घेरी -बेरी चहा बिस्कुट खाही-पीही त पेट नइ बाढ़ही जी। फेर ऐकर ले कुछु नइ होवय। काबर कि घर म ठलहा बइठे-बइठे घर के बरतन, झाड़ू पोछा घलो निपटाए ला पर जाथे। जिहां देखबे तिहें खेला होवत हे। कोनो ला कोरोना बैरी के डर नइये। अस्पताल म, स्मसान घाट म, दवाई दुकान म, बंगाल म अउ हरिद्वार म सबो जगा खेला माते हे। अब खेला ले जउन बांच जाही तउन ह अपन भाग मानय अउ ऊपर वाले के किरपा।
असली खेला तो ऊपर वाले ह करत हे। परकरीति ह अपन खेला खेले बर सुरू करिस त जम्मो डहर रार मच गय हवय। परकरीति के हमन बिनास करत हन त बदला म करनी के फल तो मिलबे करही।
जगत के झन करव बिनास
हरियर हरियर रूखराई ल हमन मनमाड़े काटत हन। पहार ला ढहा देवत हन। नदिया नरवा के मुंह ला चपक के घर दुवार बना डारेन। चिरई-चुरगुन ला मार-मार के वोकर राइत मचा डारेन। जंगल ला काट सहर बसा डरेन। असली खेला तो हमर रहन सहन अउ खानपान के होय हे। कहां नंदागे हमर जुन्ना रहे बसे के तरीका। पनही पहिर के अधकचरा खाना पिज्जा, बरगर, चाउमीन ला खाबो त हमर तन के अंदर के जीवनसक्ति ह बाढ़ही की घटही, बतावव। संगवारी हो परकरीति के संग रहव। वोकर संग जुडव, वोकर इसारा ल समझव, वोकर इज्जत करे ल सीखव,तभे ये खेला ह रुक पाही अउ ये धरती के जम्मो जीव ह सुख-चैन से रइ पाही।

Gulal Verma Desk
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