मसीनरीजुग म लोगन ल ‘चूना’ लगाय के नवा काम

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Published: 03 May 2021, 04:08 PM IST

मितान! आज के जमाना ह नवा-नवा काम करे, नवा-नवा जिनिस बनाय अउ नवा-नवा गियान पाए के आय। जम्मो दुनिया ल नवा-नवा चाही। नवा याने के कुछु अलग चाही। आजकाल किरकेट सिखाय के इस्कूल (अकादमी) खुलत हे। कोचिंग सेंटर खुलत हे। फेर, ये सब ह जुन्ना हो गे हे।
सिरतोन! कतकोन मनखेमन तो ‘चूना लगाय के दुकान’ खोल के बइठे हें। ऐमन अपन दुकान म बडक़ा-बडक़ा अंगरेजी अक्छर म ‘चूनालॉजी’ लिखे रिहिथें। ऐहा एकदम नवा किसम के दुकान आय। आपमन बॉयलॉजी, जियोलॉजी, जूलॉजी के नाव अब्बड़ सुने होहू। फेर, ये ‘चूनालॉजी’ ल पहिली पइत सुनत होहू। अब आपमन पूछहू के ये दुकान म मिलथे का? बेचथे का? का चूना ले घर पोते बर सिखाय जाथे या चूना ले पथरा-ईंटा जोड़े बर सिखाथें।
मितान! पहिली जमाना म हमर देस म चूनेच ह चलत रिहिस। तब तो मकान, बडक़ा-बडक़ा महल, मंदिर-देवालय, पुल-पुलियामन घलो चूना-बजरी ले बनत रिहिस। अब तो सबो बदल गे हे।
सिरतोन! चूना का, अब तो मनखे ह घलो बदलत हे। मनखे के मिजाज, आदत, बेवहार ह बदलत हे। अब पान म चूना लगाय बर नइ, बल्किन ‘मनखे ल चूना लगाय’ बर सिखाय जात हे। ये दुकान ह तो दिनोदिन चमक हे। आज चारोमुड़ा ‘मनखे ल चूना लगाय के कारोबार ह फइल गे हे। पता नइ चलय के कब, कोन ह ‘चूना’लगा दिही।
मितान! ईमानदारी से चूना तो पान दुकान वाले ह पान म लगाथे। पान दुकानदार ह जानथे के पान म कतेक चूना लगाय बर चाही के खवइया के गाल झन कटय अउ वोला पान खाय के मना घलो आय।
सिरतोन! पान म चूना लगई ह जुन्ना काम ए, अउ मनखे ल चूना लगई ह नवा। जुन्ना काम ह ‘ईमानदारी’ के ए, अउ ये नवा काम ह ‘बेईमानी’ के। मनखे ल चूना लगई के मतलब हे कि दुनिया ल ***** बना के, ठग के, धोखाधड़ी करके कइसे पइसा कमाय जाय? अब देखव, आपमन रोज अखबार म पढ़थव के फलाना मनखे सैकड़ों मनखे ल ठग के भाग गे। कतकोन ठगमन पकड़ म घलो नइ आवय।
मितान! आधुनिक जुग म सुविधा के जिनिस कम्प्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट, वाट्सएप, फेसबुक ह लोगन के चूना लगाय के, ठगी करे के साधन बन गे हे। नवा पीढ़ी ह अपराध के दलदल म फंसत जावत हे। नवा-नवा ढंग ले लोगन ल लालच देके, फंसा के बैंक के खाता ले पइसा गायब कर देवत हें।
जब आधुनिकता के नाव म समाज म नैतिक अउ चरित्र पतन होवत हे। पद, पइसा अउ पावर ह आज ‘सबकुछ’ हो गे हे। लोगन ल ‘चूना लगई’ ह ’रोजगार’ बन गे हे। कानून ह घलो ठगाय कस दिखई देथे, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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