भासा-संस्करीति के बढ़वार हो

बिचार

By: Gulal Verma

Published: 03 May 2021, 04:32 PM IST

कोनो भी छेत्र या राज के चिन्हारी उहां के भाखा अउ संस्करीति दूनों के माध्यम ले होथे। ऐकरे सेती ये दूनों ल ही उहां के चिन्हारी या अस्मिता कहिथें।
छत्तीसगढ़ी अस्मिता के अलग चिन्हारी खातिर जब ले अलग राज खातिर आन्दोलन चालू होय रिहिसे, तब ले मांग चलत रिहिसे। जिहां तक भाखा के बात हे, त येहा इहां के गुनिक साहित्यकारमन के माध्यम ले सैकड़ों बछर ले चले आवत हे। ऐकरे परसादे आज छत्तीसगढ़ी भाखा ह देस के आने कोनो भी लोकभाखा के मुकाबला म कमती नइये। फेर, जिहां तक संस्करीति के बात हे, त ऐकर अलग चिन्हारी के बुता ह आजो ढेरियाअसन दिखथे। जब भी छत्तीसगढ़ी संस्करीति के बात होथे, त आने राज ले लाने गे संस्करीति अउ ग्रंथ ल ही छत्तीसगढ़ के संस्करीति के रूप म माने अउ जाने के बात करे जाथे। गुनिक साहित्यकारमन घलो ये मामला म थथमराए असन जुवाब दे परथें। जबकि ये स्पस्ट कहे जाना चाही के दूसर राज ले लाने गे संस्करीति छत्तीसगढ़ के मूल या कहिन इहां के मौलिक संस्करीति नइ हो सकय। मौलिक या मूल संस्करीति उही होथे, जेन इहां तइहा-तइहा ले चले आवत हे। अस्मिता के अपन दूनों अंग के बढ़वार के बुता ल संगे-संग करन। सिरिफ भाखा-भाखा करत रहिबो त संस्करीति संग पहिलिच जइसे अनियाय होतेच रइही। अउ जब तक संस्करीति संग अनियाय होवत रइही, तब तक हमर अस्मिता के भरपूर बढ़वार कभु नइ दिखय।
मूल संस्करीति बर आंदोलन जरूरी
कोनो मनखे के एक आंखी मूंदाय रइही अउ एक आंखीभर ले वो देखही त भला वोकर छापा ह जगजग ले कइसे दिखही। ठउका इही बात हमर अस्मिता उप्पर घलो लागू होथे।
ऐकर एक अंग पिछवाए रइही त बिकास के रद्दा वो कइसे रेंगे पाही।् भाखा आन्दोलन चलत इहां कतको बछर होगे हे, फेर संस्करीति ल वोकर ले अलग रखे के सेती वो मंजिल तक पहुंच नइ पावत हे।
संगी हो! बहुते जरूरी हे भाखा संग इहां के मूल संस्करीति के आन्दोलन ल घलो संघारिन। तभे हमन ल सफलता के सीढिय़ा चघे बर मिलही। अउ तभेच हमर अस्मिता ह सही मायने म चारोखुंट जगजग ले दिखही।

Gulal Verma Desk
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