हमर छत्तीसगढ़ अउ गोस्वामी तुलसीदास

समाज

By: Gulal Verma

Published: 12 Jul 2021, 03:55 PM IST

भारतीय साहित्य म गोस्वामी तुलसीदासजी ह समाज अउ संस्करीति ल एक सूत म पिरोवत महापुरुस के रूप म हवे। आज कई बछर बाद उंकर लिखे गरंथमन मनखे के अन्तस ल सावचेत करत जिनगी के रद्दा देखावत हे। गोस्वामी तुलसीदास के रचनाकाल दू संस्करीति के बीच उपजे मनमुटाव अउ समाज म असंतोस, ढोंग अउ जुलुम के बीच के हवय। तभे तो तुलसी कवितावली म लिखथे-
खेती न किसान को,
भिखारी को न भीख बलि।
बनिक को बनिज
न चाकर को चाकरी।
दारिद-दसानन,
दबाई दूनी, दीनबन्धु
दुरित-दहन देखि तुलसी हहा करी।
समाज म आए अइसन विपत के बेरा म तुलसीदासजी ह अपन रचना म संस्करीत के जगा अवध के अवधी बोली म करिन। वो समाज के दीन-हीन, छोटे-बड़े के ल राम के लीला ले जिनगी के आने -आने रूप के, नता-गोत्ता, राज-धरम के दरस कराय बर चाहत रिहिस। अवध (उत्तर कोसल) ले छत्तीसगढ़ (दक्छिन कोसल) के जुड़ाव सदा दिन ले राज-धरम, बेटी-रोटी, भाखा-बोली अउ संस्करीति के हवय। ऐकर सीधा परभाव गोस्वामीजी के साहित्य म पड़े हवय। अवधी छत्तीसगढ़ी असन हिंदी के बोली होय के सेती तुलसी के साहित्य म कतको सब्दमन छत्तीसगढ़ी के तीर हवे।
तुलसी के आराध्य परभु राम छत्तीसगढ़ के भांचा आय। ऐकर छाप हमर संस्करीति म आज घलो ेदिखथे। हमन भांचा ल आज पांव छूके आदर देथन। बिद्वानमन ले सुने बात आय के रामबनवास के कई बछर हमर इही माटी म बीते हवय। सरगुजा, सबरी आसरम, सिरिंगी, राजिम, सिहावा, कांकेर, नारायनपुर, दंतेवाड़ा म ऐकर कतकों सउहत परमान हवय। सप्तरिसि के तप भूमि, सिरिंगी के डेरा, सबरी के नवधा भगती के संदेस इही माटी म मिले हवय।
राम के मरयादा रूप जात-पात के भेद के दूरिहा, निसाद, भीलनी, सबरी के जूठा बोइर खाना असन कतको उदाहरन ह इहां के समाज उत्थान बर संत परंपरा ल रद्दा देखाथे। राम जब सबरी तीर जाथे तब सबरी के ये भाव-
‘केहि विधि अस्तुति करौ तुम्हारी।
अधम जात मैं जड़मति भारी।’
तब राम के उत्तर-
‘कह रघुपति सुनु भामिनी बाता।मानऊ एक भगत कर नाता।।
जाती पाती कुल धर्म बड़ाई।
धन बल परिजन गुण चतुराई।
भगत हीन नर सोहइ कैसा बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।
रमायनकाल के ही हमर छत्तीसगढ़ म गुरु परंपरा के बरनन मिलथे। विस्रवा, मतंग, अत्रि, वाल्मीकि, सिरिंगी, लोमस एकंक असन कतको मुनिमन के इहां बसेरा रहिस। राम के दूनों बेटा लव-कुस के जन्म इहेंच माने जाथे। ये सब बात ह हमर सामाजिक रचना म रच-बस गे हे। रामनवमीं, दसरहा, देवारी म हनुमान जयंती म राम अउ रमायन के पात्र मन पूजाथे।
बस्तर दसहरा, रामलीला, चौमास म अखंड रमायन पाठ, रामधुनी, रमायन सम्मेलन अउ छ_ी बरही, नवा काम कारज म रमायन पाठ करत गांव-गांव म रमायन मंडली म तुलसी के संदेस ल बगरावत हवे। भाखा बोली म घलो राम के रूप समागे हे। हमर दिन राम -राम ले चालू होथे। ककरो संग मिले भेंट म राम- राम के जोहार, त जिनगी के आखिर म राम नाम सत्य हे।
हमर जिनगी म हाना भांजरा के रूप म घलो तुलसी के राम के रूप ह समा गे हवे। जइसे-
चार बेटा राम के, कौड़ी न काम के।
लेगही तेन ल बचाही कोन राम,
अउ बचाी तेल लेगही कोन राम।
उप्पर म राम -राम तरी म कसाई।
राम बिन दुख कोन हरे,
बरखा बिन सागर कोन भरे।
जिहां राम रमायन,
तिहां कुकुर कटान।
इहां जिनगी म तुलसीदासजी के संदेसमन सामाजिक जीवन ल मजबूत करथे, तभे तो इहां के घर -घर म रमायन पूजाथे अउ गुनीमन सांझे बिहाने चौपाई पढ़थे। ऐकरे परभाव आय के इहां दाऊद खान असन मुस्लिममन घलो रमायन के सन्देस जनता के बीच देथय। अउ छत्तीसगढ़ के मधुर कंठ जनाब मीर अली मीर ह रमई पाठ के सुंदरता के बखान करथे।

Gulal Verma Desk
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