दुनिया हे त किसम-किसम के दुनियादारी घलो हे

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Updated: 12 Jul 2021, 04:12 PM IST

fजहां चार संग संगी-सकलाथें, तहां किसम-किसम के गोठ-बात सुरू हो जथे। कोनो संगवारी ह ठठ्ठा-दिल्लगी करथे, कोनो ह अपन घर-परिवार के दुख-सुख के बात बताथे, त कोनो-कोनो ह दुनियादारी के गियान बघारे लगथे। अइसने एक संगवारी मंडली के गोठ-बात सुनव।
एकझन संगवारी कहिस- संगी हो, रोटी के बाद म मनखे के सबले बडक़ा जरूरत हे परेम के। मनखे के दिमाग म परेम के बीजा के पीकी तो उही दिन फूट गे रिहिस, जब भगवान ह वोला जनम दिस। ये बात ह अलग हे कि आज परेम ह जात, समाज, देस म सिमट के रहि गे हे। आज के पीढ़ी परेम नइ, परेम के दिखावा करथे। परेमी-परेमिकामन एक-दूसर ल महंगी जिनिस (गिफ्ट-उपहार) देथें। परेम कम करथें, परेम के ढोल जादा पिटथें। अइसे लागथे जइसे-जइसे समाज म बेरोजगारी बाढ़त जावत हे, वइसे-वइसे दिलफेंक मजनूमन के गिनती घलो बाढ़त हे। पढ़े-लिखे के बाद निठल्ला बइठे नौजवानमन करा का इही काम रइ गे हे!
दूसर संगवारी बोलिस- भइया हो, भगवान ह रात ल सुते बर बनाय हे। मनखे दिनभर मेहनत-मजदूरी करथे, खेती-बाड़ी करथे। सांझकुन अपन काम-बुता ल निपटा के कुछ समे संगी-साथी, परिवार वालेमन संग गपियाथे अउ सुत जथे। रातकुन सिरिफ चोर-उचक्कामन जागथें। चोरमन से बचे खातिर पहरेदारमन ल घलो रात म जागे बर परथे। धीरे-धीरे दिन ह मनखेमन बर कम परे लगिस अउ वोहा अपन धंधा रात म घलो बढ़ा लिस। रात म काम करइयामन दिन म सुतत हें। ककरो बर दिन ह रात अउ रात ह दिन होगे हे। दिन-रात के ये गड़बड़झाला म मनखे के जिनगी के लय घलो टूटत हे। अरे भले मानुस हो, ये धरती म मनखेभर नइ सुतय, रूख-राई घलो सुतथें। चिरई-चिरगुन सुरताथें। पता नइ ये सरकारमन ल का सूझत हे, जउन रात ल जबरदस्ती दिन बनावत हें। ऐकर से मनखे चिड़चिड़ा बनत जावत हे।
तीसर संगी कहिस- संगवारी हो, पलटई ह एक कला होथे। रोटी ल नइ पलटबे त वोहा नइ सेकावय। छेना ल नइ पलटबे त बने आंच नइ आवय। वइसे नेतामन ह अपन बात ले अउ सरकारमन ह अपन वादा-दावा ले पलटते रहिथें। जेन दल ल पानी पी-पी के कोसत रहिथें, उही दल म चल देथें। तहां जुन्ना दल अउ वोकर नेतामन ल कोसे बर सुरू कर देेथें। वाह रे राजनीति अउ राजनीति करइया हो।
ये दुनिया ह अजब-गजब हे अउ इहां रहइयामन के हाल-चाल, रंग-ढंग ह तो दू हाथ अउ लमरी हे। एक कोती मनखे मेहनत के काम नइ करे के सेती मोटावत जावत हे, दूसर कोती भूख के सेती कतकोन मनखे रेगड़ा होवत हें। जादाझन मनखे बस काम के पाछू दिन-रात भागत हें। इहू जिनगी का जिनगी ए। भागमभाग के जिनगी म मनखे करा दू घड़ी बने बइठ के सुख-दुख के बात करे के घलो समे नइये, त अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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