बइरी बिहाव

कहिनी

By: Gulal Verma

Updated: 13 Sep 2021, 04:51 PM IST

घरघरात मोटर ह पीपर तरी हबर गिस। लटपटलिया ढकेलत ढकेलत बंसी ह अपन थइली ला धर के उतरिस। घर म बंसी ल आवत देख के वोकर ददा ह ढेरा ला मढ़ा दिस। थइली ला मढ़ा के अपन ददा के पांव परिस। वोकर ददा ह बंसी के दाई ला हूंत करावत कहिस- देख तो जमुना के दाई, ये दे दाऊ ह आगिस। ओतके हुंकारू ला सुनके दाई बटकी ला मढ़ा दिस अउ एक लोटा पानी लाने बर चल दिस। दूरिहा ले अपन दाई ला पानी लेके आवत देखिस। सूखा गे रहय महतारी, कांटा हो गे रहय । बंसी ह पांव परिस त दाई ह मनेमन म मोर बेटा ला सब्बो सुख मिलय भगवान ये कहत रहय। फेर, ऊपर ले सुरही गाय असन आंसू गिरत रहय। बंसी नइ देख सकिस महतारी के मुंह ल। कलेचुप लोटा ला धरिस अउ गोड़ धोय बर रेंग दिस।
कुरिया के फरिका ला हेरिस। भीतर गिस त का देखथे- खटिया ह परे हे, दसना ह परे हे। वोकरमन तो खाली नइ रहय। मन ह गरु होवत रहय। वोला घर ह चाबे बर कुदात लगिस। आंखी मं झुले लगिस बिहाव के गोठ ह। ‘बइरी बिहाव’ के गोठ । एक -एक ठी गोठ के सुरता ह पानी म तेल सही उफलाय लगिस।
बिहाव के मंडप गहगहावत रहय। भई ! बडक़ा बाबू ये बंसी ह अउ पढ़े- लिखे नउकरीहार बेटा के बिहाव। फटाका, डोला, मंगलखाना सब्बो लेगे रहिन। समधी भेंट म कका ह धकियाइच दिस। मंझला कका ससुर ल । फेर थोरको समे के जाय म एकझन घरतिया आ गिस ददा ल बलाय बर। ददा गिस त का होथे। ससुर कहे लगिस- समधी! झाबा अउ नांगमोरी तो नइ लाये हव का जी? ददा कहिस- महाराज लकर-पकर के बिहाव तो होवत हे। नइ बनिस रे भाई, ले अब बहुरिया ला घरे मं पहिराबो। कइसनो करके पार कर रे भाई। हमन तो नइ कहन गा। तंय दूठन चुरी ला पहिरा के निकार दे न अपन बेटी ला। कुछु कहिबो ते हमला कहिबे। गोठ ह गढ़ा गिस। कहा- सुनी होगे। ससुर कहि दिस तंय लहुंटा ले अपन बरात, नइ देवंव अपन बेटी, तोला देख डारेंव मंय। ददा घलो गुस्सागे अउ कहि दिस -संसार म तोरेच नोनी नइये अउ कतको हवंय।। आखिर मंं बंसी के ददा सब्बो गोठ ला सुनिस- अउ कहिस- बंसी अब नइ जानंव मंय। तोला जइसन दिखते कर। ददा के नइ चाहती म बंसी ह अपन ससुर मेर जा के का-का नइ कहि डारिस होही। ससुर ला मनावत कहिस - तूं कोन ला देख के अपन बेटी ला देवत हव, मोला न। ससुर ला मनाइस अउ किरिया खावत बंसी कहिस -तुंहार नोनी ला कुछु किसिम के दुख देबो त कहिहव। लटपट मानिस अउ रोवत -धोवत बिहाव होगे।
चार दिन अपन मयारू के संग रहिस बंसी। घर ह वोला महल लगय। सुवारी बपुरी नवरिया रहिस तब्भो कतेक मया ले हाथ-गोड़ मिंजय। फेर, जादा गोठिआवय नइ। लजकुरही रहिस न तेकर खातिर। नवा- नवा दू दिन रही अउ जइसने जुन्नात जाही। दुबराज चाउर कस उज्जर फेर का हे देख, सुवा असन नइ बोलही त कहिले। चारे दिन के नहके मं लेनहार आ गिस। ददा ला कहिस -नोनी ला लिहे बर आये हंव। वोकर दाई ला बने नइ लागत हे।ददा घलो सच आय कहिके पतियागे। संझकेरहा चलदिन वोमन मोटर मं। जाय के बेरा बंसी गोठिआय त घलो नइ पाइस।
भइया चल न खाबे गा, उठ न गा, चल न गा थपथपावत छोटकी बहिनी ह उठाथे। खाय-पीये के ठिकाना नइ रिहिस। दाई कहिस- अरे ये का होगे बंसी बेटा तंय दिनोंदिन सुखावथस गा। तोर ससुर ला तो देख बेटा आज चार महीना होगिस। न कांही सोर- संदेस पठोय के नांव, न कुछु न कांही। अइसे लगत हे बेटा के ओहू नइ चाहत हे। का होगे भगवान ! कहां ले बिहाव कर दे मोर बेटा के। मंड़वा मं छोड़ दिये रइतेंन त ये सब देखे बर नइ परतिस वोकर करनी ला।
ददा के गोठ ह वोला गुलेर-गोंटा असन परिस फेर कइसे करय। ठीकेच तो कहिथे- नइते काबर अइसन होतिस। फेर सोचथे चारे दिन तो रहिस न सुवारी ह वोकर संग। का देखिस वोहा, का जानिस, वोकर दोस का हे ऐमा बपुरी के। मइके के गेरूवां मं बंधाय हे। ढिलही वोमन ततो आही। निचट बिहनिया उठिस बंसी ह अउ चल दिस मोटर टेसन । देखते रइगिन दाई ददा। मोटर मं चघिस। बंसी ला का दिखथे के दूरिहा सडक़ मं दाई -ददा सुत गिन हांवय। सुवारी भागत रहय उही मइके के रद्दा मं, जउन मं वोकर चघे मोटर जवइय्या हे। वोला दाई -ददा कहत दिखथे- झन जा बेटा। मोटर के कंडक्टर ह हलावत पीठ ला कहिथें- ये बंसी गउंटिया सारंगढ़ जाहा न जी, पइसा दे देवव न। सब्बो धियान उज्झर जाथे अउ मोटर ह दाई- ददा के सुस्तायें छइहां मं घर-घरावत रेंग देंथे।

Gulal Verma Desk
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