रइपुर के गनेस परब

परंपरा

By: Gulal Verma

Published: 13 Sep 2021, 05:26 PM IST

रइपुर के गनेस परब मनाए के परंपरा जादा जुन्ना नोहे। अभी तक अलिखित परमान के मुताबिक रइपुर के पुरानी बस्ती, गंजपारा म गनेसजी के जुन्ना मंदिर मिलथे। बाद म बूढ़ापारा चउक अउ अग्रसेन चउक म घलो गनेस मंदिर बने हे। यहू माने जाथे के अजादी के आंदोलन के पहलीच ले पुरानी बस्ती के दाऊ घर निजी रूप म पूजा करे के परंपरा रिहिस हे। वइसे 1920 के बाद अजादी के आंदोलन के साथ गनेस परब ल जोड़े जाथे। फेर, हमर छेत्र म वइसन परब उत्सव नइ होइस। 1947 के पहिलेच छुटपुट परंपरा रिहिस। तभो ले गनेस उत्सव ह सौ बछर ले जादा के परमान देथे। वोमे लोहार चउक, पुरानी बस्ती, गुढिय़ारी, स्रमजीवी गनेसोत्सव टिकरापारा के नाम जोड़े जा सकथे।
यहू परमानित हे कि १९३५ म पहली पइत रास्टरीय विद्यालय रइपुर ले सिरजन झांकी जुलूस निकलिस। देस-परेम के नारा के साथ इही जुलूस म सुराजी बीर रविसंकर, महंत लछमीनारायन, ठाकुर प्यारेलाल, डॉ. खूबचंद बघेल आदि सामिल रहिस। कोरोनाकाल के सेती पाछू दू बछर ले गनेस बिसरजन झांकी-जुलूस बंद हे।
गनेस परब रइपुर म दू परकार ले होथे। एक अपने जगा म स्थापित अउ सजावट अउ दूसर हे बिसरजन झांकी अउ जुलूस। जुलूस झांकी म सबले पहली जानबा हे कि हांडी तरिया म गनेस मूरति बिसरजन होत रहिस। यहू संकेत हे कि करबला तरिया म घलो छुटपुट बिसरजन होइस। ये जम्मो घटना अजादी के पहिली के बात आय। अइसे माने जाथे कि 1950 से 1970 के बीच म तेज गति से बिकास अउ उछाह उमंग आइस। रात-रातभर जगा-जगा स्थापित परतिमा स्थलमन म धारमिक, सांस्करीतिक, साहित्यिक कारयकरम होवय। लोगनमन रात-रातभर गनेस पंडाल म सजे झांकीमन ल देखंय। लम्हरी-लम्हरी लाइन लगाय बर परय। बड़ ऊंच अउ सुग्घर-सुग्घर मूरतिमन मन ल मोह डरय। बिसरजन झांकी देखे बर रइपुर सहर समेत दूरिहा-दूरिहा गांव, कस्बा, सहर के लोगनमन आवंय। रइपुर के हर गनेस समिति (हलवाईलाइन, गुढिय़ारी पड़ाव, राठौर चउक, सारदा चउक अउ अब्बड़ अकन) के अलगेच-अलगेच इतिहास अउ किस्सा-कहिनी, सरद्धा-भगति हे। बूढ़ातरिया ल परदूसन ले बचाय बर अब झांकीमन के बिसरजन महादेव घाट म बनाय कुंड म होथे।

Gulal Verma Desk
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