अपन भीतर के ‘रावन’ ल कब जलाहू !

का- कहिबे

By: Gulal Verma

Published: 11 Oct 2021, 04:46 PM IST

सबो डहर रावन के पुतला जलाय जाही। कतकोन बछर ले जलावत आवत हें अउ कतकोन बछर ले जलाबेच करहीं। रावन के पुतला ह कतकोन किसिम के रहिथे। कहुं एक मुड़ी रहिथे, त कहुं दस मुड़ी के। अब तो सहरमन म हर बछर रावन के पुतला ह ऊंच होवत जावत हे। लइकामन मिलजुर के बांस म बोरा, पइरा, कागज लपेट के छोटकुन रावन बनाके घलो जलाथें। फेर, रावन ह मरबेच नइ करय। लइका-सियान सबोझन दसहरा के दिन रावन मारे के बस रसम भर निभाथें। कोनो ल रावन के समूल नास करे के चिंता नइये। तेकरे सेती हमर देस अउ समाज म अतेक रावन हे के वोमन सिधवा, ईमानदार, नैतिकवान मनखेमन ल नइ घेपंय। ‘रावनमन’ के राज चलत हे!
ऐती जनम ले दुखियारी, मंतरी, संतरी, साहबमन के सताय, बेपारीमन के लूटे-चूसे जनता बोकखाय सब देखत रहिथे। वोहा कोन जनी कतेक बछर ले सोसन के डोरी म बंधाय हे। जनतंत्र म तो भरस्टाचारी, बेईमान, लबरामन अड़बड़ मजा उड़ावत हें। याने के जेन ह चुनई जीत गे, कुरसी म बइठगे, वोकर सात पुरखा ल काम-बुता नइ करे के लाइसेंस मिलगे समझव! पांचेच बछर म अतेक धन-दउलत सकेल डरथें के वोला रखे बर हमर देस के बइंक ह घलो कम पर जथे। सुपरीम कोरट ह घलो पूछथे के चुनई जीते के बाद सांसद, विधायकमन के धन-दौलत ल मड़माड़े कइसे बढ़ जथे?
लोकतंत्र ह जनता बर, जनता के दुआरा, जनता के सरकार आय। नेता माने जनता अउ देस के सेवा करइया सेउक। फेर, अब के नेतामन तो लोकतंत्र ल लूटतंत्र बना डारे हें। जनता ल जावन दव भाड़ म, मरन दव भूख-पियास म। जनता के सेवा करे म का मिलही! जेमन खुदे हमन ल चुने हे, तेमन कोन मुंह ले बोलही! इही सोच के सेती देस म ‘रावन’ बाढ़त हें।
बाली ह जइसे दूसर के ताकत पाके गरजय। जइसे भस्मासुर ह भगवान भोलेनाथ ल दउड़ाय रहिस हे। वोइसने भरस्ट अधिकारी-करमचारी, बेपारी, उद्योगपति, ठेकेदार, पूंजीपतिमन बेईमान नेतामन के सह पा के जनता के हक ल झपटत हें, सुख-चैन के हरन करत हें। लंका म राज करइया रावन ल घमंडी, अहंकारी, दुस्ट माने जाथे। हमर देस म राज करइयामन के इही रूप अड़बड़ देखे बर मिलथे। समाज म अपराध, अनाचार, अतियाचार बाढ़त हे। दिनोंदिन नैतिक पतन होवत हे, चरित्र गिरत जावत हे। मनखे के भेस म चारोमुंड़ा राक्छस किंजरत हें। पइसा के आगू म सत-ईमान, नता-रिस्ता के दू कउड़ी के मोल नइ रखत हें।
दसहरा म रावन के पुतला के संग म लोगनमन ल अपन सबो बुराई ल जलाय बर चाही। अइसन बुद्धि लोगनमन ल देवय इही पराथना भगवान सिरीराम से हे। कलजुग म बाढ़त अनैतिकता, अधरम के समे म अउ का-कहिबे।

Gulal Verma Desk
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