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बाप बडक़ा न भइय्या, सबले बडक़ा रुपइय्या

का- कहिबे

रायपुर

Published: November 08, 2021 05:00:59 pm

संगी! आज जमाना पइसा अउ पइसा वालेमन के हे। गरीब -कुनबा के तो कोनो पुछाड़ी नइये। गरीबी ह पाप अउ गरीब होवई ह सराप बरोबर होगे हे। ‘गरीब के जीयई ह घलो कोनो जीयई हे।’ कहुं नरक होवत होही त नरकवासीमन घलो जिनगीभर अतेक दु:ख-पीरा नइ साहत होहीं।
सिरतोन! पइसा घलो ह का जोरदरहा जिनिस हे। जेकर तीर होथे उहू मनखे परेसान रहिथे अउ जेकर तीर नइ रहय उहू ह दुखी रहिथे। पइसा के महिमा तो आज ले नइ, तब ले गावत हावंय जब ले ये दुनिया बने हे। जब मनखेमन हलाकान रिहिस होंही त कोनो चतुरा ह पइसा बना दिस लागथे!
संगी! आज के दुनिया म जेकर तीर पइसा हे वोकरे पूछइया हे, वोकरे मान-गउन होवत हे। कतकोन मनखेमन कहिथें के, पइसा ह मुंड़ म चघ के बोलथे। सहिच बात लागथे। जउन मनखे तीर पइसा आ जथे वोकर एक नइ, दू कोरी मुंहु हो जथे। जेन ल कभु चटनी चाटे के सऊर नइ रहिस, वोहा बिहनिया-बिहनिया कुकरा के अउ सांझकुन बोकरा के टांग चिचोरे बर लगथे। जेन कभु दही-मही नइ पीये रहय, वोहा दिन म बीयर अउ रातकुन महंगा अंगरेजी सराब पीये बर धर लेथे। इही ल कहिथें, पइसा बोलथे।
सिरतोन! पइसेच ह रंग-रूप हे। पइसा हे त सबो जिनिस हे। मनखे ह मरे के बाद पइसा ल अपन संग नइ लेग सकय। तभो ले पइसा वालेमन के घमंड अब्बड़ होथे। अपन आगू गरीब मनखेमन ल कुछु नइ समझंय।
संगी! कमाल के समे हे। भुइंया म उपजे बर के रूख ह धीरे-धीरे कमतियात जावत हे। फेर, पइसा वाले मनखेमन ह बाढ़त जावत हें। बर के रूख म अब्बड़ गुन होथे। छांव, फर, हवा, हरियाली देथे। चिरई-चिरगुनमन ल आसरा देथे। फेर, ए पइसा वालेमन तो ललचिहा, सुवारथी अउ मतलबी होथें। दूसर के दु:ख-सुख के फिकर नइ करंय।
सिरतोन! जेन जगा बर रूख रहिथे, वो जगा दूसर रूख नइ पनपय। वइसे, पइसा वाले मनखेमन ह दूसर मनखे ल आगू नइ बढ़हन दंय। पइसा वालेमन के ये खेल ह घर, परिवार, समाज, जात-बिरादरी, राजनीति, खेल, साहित्य, कला, नाटक, कविता सबो जगा चलथे। लोगन ल जात-धरम म बांट के अपन सुवारथ साधथें। गरीब अउ गरीबी के नांव लेके राजनीति करथें। हां, कुछ पइसा वालामन जरूर दान- दक्छिना, मदद करथें। स्कूल-कालेज, अस्पताल, अनाथालय खोलथें। फेर, अइसन मनखेमन ल अंगरी म गिने जा सकथे।
जब मनखे ह मुठा बांधे आथे अउ हाथ परासे जाथे। एक काड़ी ल घलो अपन संग म नइ ले जाय सकंय। न कफन म खींसा रहय, न कब्र म तिजौरी, तभो ले जिनगीभर धन-दउलत के मोह-माया म फंसे रहिथें, त अउ का-कहिबे।
बाप बडक़ा न भइय्या, सबले बडक़ा रुपइय्या
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