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अब तो गांव ह साहर कस हो गे हे

गांव गाथा

रायपुर

Published: November 15, 2021 04:47:57 pm

गांव बदल गे हे। पूरा देस के गांव बदल गे हे। अब प्रेमचंद अउ फनीस्वरनाथ रेनु के गांव गंवागे। हमर बड़े लेखक केयूर भूसन के किताब के नाव इही हे। जुन्ना गांव गंवा गे। नवा गांव, नवा नवा मकान, नवा रंग-ढंग, खाय पीये के नवा तरीका, पहिरे-ओढ़े के नवा चलन देखते बनथे। अब तरिया के पानी पहिली सही झलमल -झलमल नइ करय। नरवामन सुक्खा पर गे हे। गाय-बछरू कमतिया गे हे। जमीन वालामन अधियारा खोजथें। पहली नौकर सौंजिया खोजंय। गांव-गांव बारी-फारम हाउस, पोल्टरी फारम हो गे हे।
अब तो गांव ह साहर कस हो गे हे
अब तो गांव ह साहर कस हो गे हे
मं य अब गांव म रहिथंव। भेलई म जिनगीभर नौकरी करेंव। उहां मकान बना के रेहेंव, फेर अपन गांव ल भुलाय नइ सकेंव। कुम्हारी तीर हे मोर गांव लिमतरा। लइकामन नौकरी-चाकरी म लगगें। बेटा के नौकरी रइपुर म हे। लिमतरा ले आना-जाना जादा सुमितहा हे। रइपुर-भेलई के बीच म हमर गांव।
लिमतरा म खेती-बारी घर-दुवार हे। आना भर रिहिस हे। आय गेंन त गांव के संगवारी, भाईमन ल खुसी होइस। मंय अपन गांव म सदा दिन कांही कुछु कारज करवाते रहिथंव। 1995 म डॉ. चरनदास महंत, विजय गुरु, सत्यनारायन सरमा, ताम्रध्वज साहू, डॉ. प्रमोद वरमा ज्ञानेन्द्र पति, ताराचंद साहू आय रिहिन। भूपेस बघेल तो अतेक आय हे कि इही गांव ह वोकर गांव सही होगे हे। हमर गांव म सोनहा धान कला दल हे। महेस के लोकमया हे, त कडरका वाला कलाकार के राजेन्द्र साहू के लोक धारा हे।
ये गांव ह टिकेन्द्र टिकरिहा के गांव ए । बडक़ा साहित्यकार रिहिस। दानेस्वर सरमा इही गांव म रहिके कला साहित्य के मरम ल पइस अउ नाव कमइस। भागवत आसरम वाले निरंजन महराज, एक लाख आंखी के आपरेसन करके नाव कमाने वाला डॉ. लाखेस, बड़े न्यूरोसर्जन सत्यनारायन मढ़रिया इही गांव के सपूत ए। सबोझन देवारी मनाय बर गांव आथें। मोला गांव म जाके बसे के बात ल सुन के भेलई (भिलाई) के संगीमन रिसागे। किहिन तंय उहां नइ रहे सकस। तोला फेर भेलई आय बर परही।
मंय केहेंव मंय जिनगीभर उहें रेहेंव। मन म गांव ह रिहिस, सरीर ह साहर म राहय। आपमन संसोझन करव। जब बलाहू आधा घंटा म भेलई पहुंच जहूं। गांव ह गांव ए। इहां संही सुख साहर म कहां। इहां बिहनिया, मुंदरहा उठइया मनखे गजबझन मिलथे। कतकोझन पांच बजे उठके भजन भाव करथें।
मोला आय सुनिस त गांव के एकझन सियनहा किहिस- बाबू मुख्यमंतरी भूपेस बघेल तोला चिनथे। तंय वोला हमर गांव म कुछू नइ त पंदरा- सोला घांव लान डरे हस। एकठन बात किहूं त मानबे? मंय केहेंव - बता न भइया, माने के लइक होही त काबर नइ मानहूं। भइया किहिस- गांव म पांच-छहझन दारू बेचथें। पारा-पारा म सराब बेचाथे। भूपेस ल बता के छापा मरवा देते।
मंय कहेंव- आपमन नइ पीहू त दारू काबर बेचाही। कोनो किताब बिसाथे का? नइ बिसावय? काबर कि कोनो पढ़बे नइ करय। त किताब के दुकान नइये कोनो गांव म। सहर म घलो साहित्य के किताब नइ बेचावय। पढ़इया लइकामन के किताब बेचाथे। गांव-गांव दारू बेचाथे। कहां-कहां छापा मरवाही भूपेश दाऊ ह। मुंह खइता मेहा अइसन बात नइ काहंव, जेला वोहा नइ करे सकय। भइया किहिस- अतेक बड़ मुख्यमंतरी ह अतकी जाड़ बात ल नइ करे सकही गा? मंय केहेंव - भइया तंय अपन बेट, भतीजामन ल टोक सकत हस का? भइया किहिस - नइ केहे संकन भाई। मुंह खइता ताय। मंय कहेंव- बस उही बात ए। बड़े पद के बड़े संसो ग। हमर गांव म आवय। जब बलावन तब आवय तउन भूपेस दाऊ नोहय। देस के नम्बर एक मुख्यमंतरी ए। हम तो वोल पहली वाला मानथन भई, भइया लमइस। मेहा हांसत-हांसत घर आ गेंव।
गांव अउ साहर के बीच पहली गजब फरक रिहिस। हेमनाथ यदु ह चंदैनी गोंदा बर गीत लिखिस। ये गीत ह गजब चलिस। गीत म यदुजी ह कहिथे के- ‘चल गांव ला छोडक़े सहर जातेन। लकर-धरक पसिया पीके कमई करे बर जाथन, बइला भंइसा कस कभाथन। रद्दा ह रेंगे के लइक नइ राहय, किचिर-काचर रद्दा, माड़ीभर के चिखला रहिथे। साहर म चिक्कन सडक़ म रेंगतेंव। इहां गांव म दीया, टिमटिमाथे। सहर म बिजली जरथे। गांव म कोलिहा हुआं-हुआं करथे। तेकर ले गांव ल छोड़ के मजा करे बर सहर जातेन।’ ये गीत के गांव अब नंदागे। अब गांव ह सहर हो गे हे। जउन चीज सहर म बेचाथे तउन गांव म बेचाथे। गांव ह साहर लहुट गे हे। जब फरके नइये त का भेलई अउ का लिमतरा। गांव म हमर घर गोंड़पारा म हे। सिरीमती मंजू नेताम गांव के सरपंच हे। लिमतरा के सतनामीपारा बहुत बड़े हे। पहली के नानचुन गांव लिमतरा अब बड़े हो गे हे। देवदास बंजारे जइसे बड़े -बड़े कलाकारमन इहां आ के कलाकारी करे हें। हमर गांव ह ‘मनखे-मनखे ल जान, सग भाई के समान’ अइसन सिद्वांत ल मानथे।

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