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बात मनखे के बहिस्कार अउ मानवता ल छोड़े के

का- कहिबे

रायपुर

Published: November 15, 2021 05:05:48 pm

सूरज ना बदला, चांद ना बदला, ना बदलता रे आसमां, कितना बदल गया इंसान।’ देख तेरे संसार की हालत क्या हो गई भगवान, रे कितना बदल गया इंसान।’ ये फिलिमी गाना ह आज के मनखे-समाज के बेवहार ल उजागर करथे। मनखे अपन करम ले गिरतेच जावत हे। ये हाल होगे हे के मनखे संग जानवर कस बेवहार करत हें। मनखे ल मनखे ले दूरिहावत हें। समाज म नियाव के नाव म अनियाय होवत हे। अंधविसवास, भेदभाव अउ सुवारथ के चलत मनखे के आंखी मूंदा गे हे। समाज ह भइरा होगे हे। मनखे ल समाज-गांव ले निकाल के का साबित करने बर चाहथें? ककरो हुक्का-पानी बंद करइयामन का खुसी मिलथे?
मितान! समाज ले बहिस्कार... गांव म हुक्का-पानी बंद... करे से कोनो मनखे या परिवार बर अभिसाप बन जथे। हमर देस-परदेस म मनखे के मनखे बर करइया अइसन अपराध ह कतकोन किसम ले आगू आवत रहिथे। बहिस्कार झेलइया के गलती कोनो मायने नइ रखय, फेर ये सजा सुनइया के रुतबा ह जरूर काम आथे। अपन रसूख के दम म कुछ लोगनमन समाज ले निकाल के अमानवीय सजा सुना देथें। ऐहा गांव-गंवई के भाखा, बोलचाल म हुक्का-पानी बंद करई आय।
सिरतोन! समाज म एकता बनाय रखई जरूरी हे। समाज के रीत-रिवाज ल बचई घलो जरूरी हे। गांव म नियम-धियम ल मनई घलो जरूरीच हे। फेर, सोला आना बात ये हे कि आखिर मानवता ल काबर छोड़ देथें। अंधबिसवास ल काबर धरे रहिथें। आज के आधुनिक, सिक्छित, मसीनरी जुग म बेकार के (औचित्यहीन) रीत-रिवाज ल निभाय बर दबाव डारथें। समाज म गरीबमन ल काबर दबाय जाथे।
मितान! कोनो मनखे/ परिवार के बहिस्कार करइया, हुक्का पानी बंद करइया, वोमन ल गांव/ समाज ले निकलइयामन ल न तो सासन-परसासन के डर रहय, न मानव अधिकार के चिंता। कतकोन माइलोगिनमन ल ‘टोनही’ कहिके जिनगीभर बर बदनाम कर देय जाथे। कोनो वोला अपन घर नइ बलावंय। कोनो बीमार पर गे त अंधबिसवास के चलत वोकरे नाव ले बर धर लेथें। ककरो संग अइसन अमानवीय बेवहार करई ल सही कइसे कहे जा सकथे? आपमन थोकिन सोच के देखव वो परिवार या मनखे के बारे म जेन ल अइसन अभिसाप झेले बर परथे, वोकरमन ऊपर का गुजरत होही? गांव के मनखेमन वोकर घर अवई-जवई बंद कर देथें। इहां तक के खुद ल समाज के कोप ले बचाय खातिर रिस्तेदारमन घलो नाता तोड़ लेथें। दुकान ले घर बर जरूरी समान नइ मिलय। बिहाव बर रिस्ता नइ आवत। मरनी म कोनो ढांढस बंधई नइ मिलय।
जब अइसन अमानवीय घटना ल रोके बर कानून-कायदा हे, तभो ले परसासनिक खामी के चलत ऐकर कोनो समाधान नइ निकल पावत हे। मनखे के संग मानवता के घलो बहिस्कार होवत हे, त अउ का-कहिबे।
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