सितला दाई के जुड़वास

संस्करीति

By: Gulal Verma

Published: 24 Jul 2018, 07:20 PM IST

असाढ़ महीना म अपन जिनगी के ताप ल जुड़वाय बर सितला दाई के बड़ भगति भाव ले दूध अभिसेक करथन जउने ल सितला जुड़वास कहिथन। छत्तीसगढ़ राज के जम्मो सहर, नगर, गांव-गांव म दाई सितला के डेरा (मंदिर) रहिथे। काबर कि हमर गांव के हियाव करइया दाईच ह रहिथे। जेन हमलन ल सरी किसम के बिधन-बाधा ले हमर अउ हमर गांव के हियाव करथे।
हमन अपन दाई के बारो मह्म्ीना सेवा करथन। चइत नवरात परब म जग जंवारा बोथन। कुंवार नवरात म करसा मढ़ा के जोत जलाथन। अपन घर के सुख-दुख के बेरा म घलो दाई ल बरोबर मनावत रहिथन। जइसे, बर-बिहाव म देवतेला परम्परा के रूप म अपन कारज ल सुफल बनाय बर बिनती बिनोथन।
कहे जाथे कि असाढ़ के अंधियारी पाख म आठे तिथि के सितला दाई ह अवतरित होइस। जेकर खातिर गांवभर के जुरमिल के असाढ़ म सितला दाई के पूजा अराधन करथन अउ दाई के जुड़वास मनाथन। जउन दिन जुड़वास मनाथन तउन दिन डेहरी ल गोबर पानी ा लिपथे। बड़े मुंदराहा ले दाई परानिमन सिातला दाई के डेरौठी के संगे-संग अपनो अंगना-दुवारी ल गोबर पानी म लिपथे। सुग्घर चउंक पूरके दीया बारथें।
बिहनिया ले एक जगा जुरिया के नान्हे-नान्हे बेटी परानिमन मुड़ म करसा ल बोह के एक संघरा गांवभर ल रेंगत उखरा पांव घुमथे। आगू-आगू सेऊकमन मांदर, झांझ-मंजीरा बजावत करसा ल परघाथे अउ सितला दाई के सेवा गाथे।
करसा परघागे चरन पखारंव
सेवा गुन ला गावंव वो।
जिनगी के ताप ला हर लेहू माया
तोर जुड़वास मनावंव वो।
सितला दाई के अंगना म जूरमिल के पूजा हवन करथें अउ संगे-संग अखंड जोत जलाथे। कोनो घी के जोत त कोनो तेल के जोत जला के दाई के पूजा अराधन करथें।
जुड़वास म सेवा गाए के परम्परा ल परमुख रूप ले मनाथे। सेउकमन गीत ले दाई के गुनगान ल गाथें अउ सेवा करथे। जुड़वास के दिन दूसर गांव ले घलो सेउकमन ह आके सितला दाई के सेवा म सामिल होके पुन के भागी बनथें। ऐहा आस्था के संगे-संग परकरीतिके पूजा घलो ए।

Gulal Verma Desk
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