कलजुग के गुरु घंटाल

कलजुग के गुरु घंटाल

Gulal Prasad Verma | Publish: Sep, 04 2018 07:32:10 PM (IST) Raipur, Chhattisgarh, India

गोठ के तीर

'संहों के लहड़े नहीं, हंसों की नहि पात। लालों की नहि बोरियां, साधु चले न जमा।Ó
महान संत अउ समाज सुधारक सद्गुरु कबीर दास ह साधु-संतमन के पहिचान के इही परिभासा दे हावय। साधु-संत उही हरय जउन ह अकेल्ला चलथे अउ एकान्त म रहिथे। 'जेकर आगू-पाछू बंदूक धरे अंगरक्छकमन दिन-रात पहरा देथे, मनखे के रेला-पेला म घेराय रथे, धन-दोगानी के सोनहा झूलना म झूलत रथे, तेमन कोनो साधु-संत नइ हो सकय।Ó अइसन ढोंगी, पाखंड़ी साधु-संत, गुरु-महंतमन के एकेचठन बुता होथे। कइसनो करके रुपिया रपोट। सोझ म नइ, त टेडग़ा म। सरधा म नइ त डरवा के। अपराध म रुपिया रपोटे के सरी उदिम अइसनमन ह करथें। हजार झन चेला-चेलीमन ल अपन सेउक बनाके अपन फंदा म फंसा के अपन चारों खूंट माछी बरोबर झुमाय रखइयामन ह कभु साधु-संत, गुरु नइ हो सकय।
भारत के इतिहास ए बात के गवाही देथे के अइसन लच्छन साधु-महात्मा के नइ होवय। आजकाल के साधु-संतमन गुरु के पबरित नांव ल बोरत हावंय अउ दूनों हाथ ले बोरा भर-भर के रुपिया अपन सात पुरखा बर सकेलत हें। सिधवा मनखेमन के मन म धरम के डर देखा के धीरे-धीरे अपन बस म करके इंकर दुख-पीरा ल छोड़ के जम्मो जिनिस ल हर लेथें। उही मनखे जउन अपन जिनगी के पढ़ई-लिखई, काम-धंधा, बेपार अउ कमई म फेल होथें, अइसनमन ह ठग-पुसारी, ढोंग-ढंचरा ल अपनाथें। आज सभ्य समाज म अइसन ठग-जग के धंधा करइया गुरु घंटालमन के गिनती दिनोदिन सुरसा के मुंहू बरोबर बाढ़त जावत हे। स्वयंभू साधु-संत, गुरु-महंतमन ह दान-धरम के नांव म करोड़ों के सोनहा भुइंया ल कब्जा करके, आसरम बनाके अपन अवैध कारोबार के अड्डा बनाथें।
असल साधु-संतमन के जिनगी खुल्ला किताब बरोबर होथे। अब के साधु-संतमन के सरी बुता-काम ह लुका-चोरा के, परदा लगाके, सुन्ना खोली, गुप्त गुफा म होथे। जेकर बाहिर म रखवार इंकर पट चेला-चेलीमन रथें। सिरतोन के साधु-संत. गुरु-महंतमन करा लुकाय-छुपाय बर कांंही जिनिस नइ राहय। 'रमता जोगी- बहता पानीÓ बरोबर जिंकर जिनगानी होथे, उहीमन ह सत-ईमान ले साधु-संत, गुरु-महंत कहाथें।
समाज के जन-जन के बिसवास, आस्था, सरधा, भगती अउ गुरु के आदर ल अइसन गुरु घंटालमन ह अवतार अउ चमत्कार के ओढऩा ओढ़ के लुटत हें। आज समाज ल अइसन ढोंगीमन ले चेतलग अउ दूरिहा रहे के जरूरत हे।

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