हमर भुइंया कारखाना उगले !

हमर भुइंया कारखाना उगले !

Gulal Verma | Publish: Jul, 13 2018 07:02:14 PM (IST) Raipur, Chhattisgarh, India

का-कहिबे...

'मेरे देस के धरती सोना उगले, उगले हीरा-मोतीÓ ये गीत ल छत्तीसगढिय़ामन अब अइसे गावत हें 'मोर छत्तीसगढ़ के भुइंया फेकटरी उगले, उगले धुगिंया-गरदाÓ। कोनो जमाना म 'धान के कटोराÓ कहवइया हमर परदेस ह ये समे उद्योगपतिमन बर 'सोन के चिरईÓ बन गे हे। कोनो भी पइसा वाला सरकार, नेता अउ साहबमन ल पटाके जमीन खरीद लेथे, कारखाना लगा लेथे।
वइसे कमई तो सबले जादा इहीच म हे। खेती-किसानी तो 'भगवान भरोसाÓ ए। कभु पानी नइ गिरय, कभु मड़माड़े पानी गिरथे। कभु सरकार के भरोसा घलो रेहे बर परथे। काबर के पलोय बर पानी तो सरकार ह देथे। खातू-बीजहा बर घलो सरकार के मुंह ताके बर परथे। फेर, कारखाना लगाय म अइसन कांही झंझट नइये। 'सइंया भले कोतवाल, त डर काहे काÓ। पइसा फेंक, तमासा देख। पइसा ल, पइसा बाढ़थे। एक लगा, सौ कमा। दूसर के जांगर म अपन घर भर। उद्योगपति कतकोन परकार के होथे। पलास्टिक के कारखाना वाले से लेके सीमेंट, लोहा, बिजली के कारखाने वाले तक। अब तो हमर परदेस के भुइंया म किसिम-किसिम के कारखाना जामत हें।
एक कोती इहां औद्योगिकीकरन अउ सहरीकरन के सेती हर बछर खेत-खार कमतियावत हे। किसानमन नउकरी करत हें। सउंजिया-कमइयामन ल काम-बुता नइ मिलत हे। वोमन कमाय-खाय बर दूसर परदेस जावत हें। सरकार ह पानी ल उद्योगपतिमन ल देवत हे। खेत-खार ह सूख्खा परत हे। फसल ल गाय-गरुवा ल चरवात हें। किसानमन करजा म बूड़त हें। त दूसर कोती उद्योगपतिमन पनपत हें। गांव-गांव म कारखाना लगत हे। खेत-खार के संगे-संग तरिया-डबरी, मइदान, समसान, रूख-राई, रद्दा काङ्क्षहच नइ बाचत हे। बाचे खेत-खार परिया परत हे। फसल करियावत हे। हवा-पानी तको सुद्ध नइ रहिगे। किसानमन ल फंसाय बर उद्योगपतिमन दलाल ढीले हें। बिना पइसा-कउड़ी लगाय अउ बगैर काम करेदलालमन अड़बड़ पूंजी जोड़त हें दलाली करके कतकोनमन बड़हर बनगें। दूसर कोती किसानमन खेत-खार बेचाय ले 'गरीबहाÓ होगे। इहां तक के कतकोन मनखेमन बाप पुरखा म नइ देखेन रिहिन जतेक पइसा पाइन तहां ले बउरा गें, दरूहा बनगे, पइसा ल उड़ा डरीन। कतकोनझन तो लोगनमन ल मुरगा-मछली खवा अउ दारू पिला के नेतागिरी करे बर धरलीन।
खेती-किसानी करइ ल अपन करम-धरम समझया-मनइया किसान तो आज नदागे हे। अब तो पारंपरिक खेती ह चौपट होवत हे। गोबर खातू नदावत हे। मड़माड़े रसाइनिक खातू डार के खेत ल बंजर बनावत हें। कतकोन किसम के दवई डार के फसल म जहर घोरत हें। जाहिर हे, आज के फसल ह लोगनमन के सेहत बर खतरा हे। अरे! पइसा कमई ह सबले जादा जरूरी हो गे हे। भले ऐकर ले भुइंया बंजर बन जाय, लोगनमन बीमार पर जाय। सरकार के काहे बस, कुरसी बचे रहे बर चाही। पावर हे त सब हे। भले खेती सिराय ले किसान मरय, वोकर बला से। अइसन हालत म अउ का-कहिबे।

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