पानी बचाय बर हे

जल संरक्छन दिवस बिसेस

By: Gulal Verma

Published: 29 Mar 2019, 04:46 PM IST

ड्डपा नी हे त जिन्दगानी हे, पानी हे त खेती-किसानी हे। जल हे त कल हे। ए बात सच आय। तेकरे सेती पुरखामन नदिया, झील, झरना के तीर म राहंय। बेरा खसलत गिस मनखे ह खेती- किसानी करे ल धरिन। खेती किसानी बर बहुचेत पानी लागथे। वो बखत पानी के जादा खपत नइ रिहिस ते पाए के पानी ह पूर जावय। आजकाल अबादी बाढ़े ले पानी नइ पूरत हे।
तइहा बेरा म राजामन बड़े-बड़े तरिया कोड़वांय। बरसात म जब पानी गिरय त सबो पानी ह बोहा के अन्ते झन होबाय सोच के डोंगरी-पहार के खाल्हे म तरिया कोड़वांय। वो बरसात के पानी ह खाल्हे बोहा के सोझ तरिया म सकलावय। ते पाए के तइहां बेरा के जुन्ना तरियामन अभी ले डोंगरी के खाल्हे देखब म मिलथे। जेमा पानी ल सकेल के रखंय।
गरमी के दिन पीये बर पानी अउ निस्तार करे बर पानी के समस्या झन होवय कहिके के पानी ल सकेल के रखंय। अभिलेख म नदिया, तरिया, कुआं, बावली के संरक्छन करे के वोला बनवाए के जानकारी मिलथे। पलारी (बलौदाबाजार) म पांडुवंसी राजामन के बालसमुंद तरिया, चंडी (अभनपुर) म पाण्डुवंसी राजामन के बावली, पुरास्थल पचराही, कबीरधाम जिला म फनिनागवंसी राजामन के कोड़वाय तरिया, कलचुरि राजामन के कोड़वाय तरिया रतनपुर म, रायपुर म कंकाली तरिया, महाराजबंद तरिया, बूढ़ा तरिया, राजिम म मराठाकाल के बावली आज ले देखब म मिलथे।
इही तरिया, डबरी, कुआं, बावली म पानी सकेलाय रहिथे। जेकर ले वातावरन म नमी बने रहिथे अउ भुइंया भीतरी के पानी के ओगरा (स्रोत) बने रहिथे। गरमी के दिन इही तरिया, नदिया, बावली अउ कुआं के पानी ले निस्तारी करथें। बोरिंग अउ नल के पानी ल पीये अउ बउरे के काम म लाथें। जब गरमी जादा बढ़ जाथे त पानी के खपत जादा बढ़ जथे। सबो जीव-जंतुमन पियास म थरथरा जथें, बियाकुल हो जथे तब पानी पीये बर तरिया, नदिया, डबरी ल खोजथें। हमन ल पुरखा के बनाय धरोहर (तरिया, बावली कुआं) के रक्छा करे अउ पानी बचाय बर हे।

Gulal Verma Desk
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