जैनाचार्य महाश्रमण बोले- सत्ता का कभी अहंकार न करें

- गुस्सा आने पर भी शांत रहना सबसे बड़ा तप
- स्वयं को जीतना ही सबसे बड़ी विजय

By: Anupam Rajvaidya

Published: 24 Feb 2021, 01:27 AM IST

रायपुर. जैन आचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि जीवन में घमंड व अहंकार नहीं होना चाहिए। अनेक रूपों में व्यक्ति में अहंकार आ सकता है। धन-पद-सत्ता का कभी भी अहंकार नहीं करना चाहिए कि मेरे पास इतनी धन-दौलत है या मेरे हाथों में सत्ता है। व्यर्थ का दिखावा-प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।
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तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें आचार्यश्री महाश्रमण मंगलवार को राजधानी रायपुर के वीआईपी रोड से पैदल विहार कर खम्हारडीह स्थित मोती प्रतीक पहुंचे। यहां आयोजित मंगल प्रवचन में आचार्यश्री ने कहा कि संसार में युद्ध होते हैं, कहीं किसी से बदला लेने के लिए तो कहीं प्रभुत्व बढ़ाने के लिए। कोई दस लाख शत्रुओं को भी जीत ले तो वह विजय बाह्य युद्ध की है। लेकिन, जो खुद को जीत ले, वह सबसे बड़ी विजय होती है। अपनी आत्मा को जीतना सबसे बड़ी विजय है। व्यक्ति दूसरों से नहीं, अपने आप से युद्ध करे।
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जैनाचार्यश्री महाश्रमण ने कहा कि गुस्सा एक प्रकार की कमजोरी है। प्रतिकूलता में भी जो गुस्सा नहीं करता और क्षमा को धारण करता है, वह वीर होता है। शांति व क्षमा की साधना के द्वारा हम क्रोध को जीतने का प्रयास करें। कई लोग उपवास, तेला, मासखमण आदि तपस्या करते हैं, पर गुस्से को जीतना बड़ी साधना है। कोई तपस्या ना कर सके, तो कम से कम गुस्से को शांत रखने का प्रयास करे, यह बड़ा तप हो जाएगा।
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आचार्यश्री महाश्रमण के प्रवचनों के बाद मर्यादा महोत्सव के अध्यक्ष महेंद्र धाड़ीवाल, सुरेश धाड़ीवाल, जैन श्रीसंघ के अध्यक्ष प्रेम लुणावत, कमलादेवी धाड़ीवाल और विजया धाड़ीवाल ने मंगल कामनाएं और भिक्षु अष्टकम की प्रस्तुति दी।
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