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मनमन के सुख

छत्तीसगढ़ी कहिनी

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मन के सुख
छत्तीसगढ़ी कहिनी

भोला..भोला.. लेना अउ बताना अंजलि के कहिनी ल। जया फेर लुढ़ारत बानी के पूछिस।
भोला कहिस- तैं कहिनी ल सुन के कइसे करबे? अई कइसे करबो, हमूंमन वोकरे सहीं आत्मनिरभर बने के उदिम करबो। कब तक पर भरोसील रहिबो। अपन जांगर म कमाबो अउ अपन जांगर म खाबो।
भोला ल जया के ए बात बने लागीस। वो कहिस- मैं चाहथौं जया के जम्मो नारी परानीमन आत्मनिरभर बनंय। अपन पांव म खड़ा होवंय। आज हमन ल जेन नारी सोसन अउ अतियाचार के किस्सा सुने ले मिलथे, वोकर असल कारन आय बेटीमन ला पढ़ा-लिखा के आत्मनिरभर नइ बनाना। मोला समझ म नइ आवय आज के पढ़े-लिखे जमाना म घलो पर के धन कहिके वोकर सिक्छा अउ रोजगार खातिर काबर धियान नइ दे जाय।
भोला लंबा सांस लेवत कहिस -अंजलि संग घलो तो पहिली अइसने होय रहिस हे। दाई-ददामन जइसे खेती-मजूरी करइया रिहिन हें तइसने उहू ल बना दे रहिन। अपन खेत के बुता ल करे के बाद वोकर दाई ह जंगल ले लकड़ी अउ कांदी-कुसा लान के तीर के सहर म बेचे ले जावय। अइसने वोकर ददा ह खेती के बुता के बाद घर उर बनाय के ठेका लेवय। अइसन म तैं खुदे सोच सकथस जया तब अंजलि अउ वोकर भाई-बहिनीमन कतका अकन पढ़त रिहिन होहीं। चौथी तक पढ़े पाइस। तहां ले उहू ह अपन दाई संग जंगल जाए लागिस। लकड़ी अउ कांदी लाने खातिर। सगियान होए लागिस त दाई-ददामन तीर के गांव म वोकर बिहाव घलो कर दीन।
कांचा उमर म भला बिहाव के अरथ ल कोनो कहां जानथें। न बाबू पिला, न छोकरी पिला। ऐकरे सेती अंजलि ससुरार म तो चल दिस फेर जांवर-जोड़ी के सुख ल नइ जानिस। ठउका बिहाव के होते वोकर जोड़ी ल पढ़ई करे खातिर सहर भेज दे गीस अउ अंजलि घर के संगे-संग खेत-खार के बुता म झपो दे गीस। ये बीच अंजलि ल अपने ससुर के गलत नीयत के तीर घलो सहे ल परीस ऐकरे सेती वोहा अपन जोड़ी ल मना-गुना के मइके म आके रेहे लगिस।
दमांद बाबू जब पढ़ लिख के हुसियार होगे त नौकरी करे के उदिम करे लागिस। अंजलि के ददा ह घर-उर बनाए के ठेकादारी करत सहर के जम्मो बड़े.बड़े अधिकारीमन संग चिन्हारी कर डारे राहय। अपन इही चिन्हारी के सेती वोकर दमांद ल सरकारी आफिस म नौकरी लगवा दिस।
अपन जोड़ी संग रहे के सुख अंजलि ल जादा दिन नइ मिल पाइस। काबर ते ससुर उप्पर लांछन लगाए के सेती वोहा मनेमन म तो चिढ़ते राहय उप्पर ले सहर म पढ़त खानी उहें के एकझन छोकरी संग वोकर आंखी चार होगे राहय। ऐकरे सेती जब वोहा नौकरी म परमानेंट होइस तहां ले ससुराल के घर ल छोड़ के सहर म रेहे लागिस। अउ वो सहरिया छोकरी संग बरे-बिहाव सही बेवहार करे लागिस। अब अंजलि ल अपन जिनगी अंधियार बरोबर लागे लागिस। वो सोचिस- सिरिफ भाई-बहिनीमन के सेवा अउ कांदी-लड़की बेच के जिनगी ल पहाए नइ जा सकय। तेकर ले फूफू दीदी जेन बड़का सहर म रहिथे, तेकरे घर जाके साहर म कुछु काम-बुता करे जाय।
अच्छा! तहां ले अंजलि अपन गांव ल छोड़ के सहर आ गे- जया पूछिस।
हहो जया, इही सहर म तो मोर वोकर संग भेंट होइस। तब ले अब तक मैं वोकर जीवन के संघर्स यातरा ल देखत हावौं। वाह भोला! वो तो आखिर पढ़े- लिखे नइ रहिस हे त फेर एकदम से ए बड़का काम ल कइसे धर लिस होही?
तैं सही काहत हस जया। अंजलि ल ए बड़का जगा म पहुंचे खातिर अड़बड़ मिहनत करे ले लागे हे। सुरू-सुरू म तो जब वोहा सहर आइस त रेजा के काम करिस। कोनो जगा घर-उर बनत राहय तिहां अपन फूफू दीदी संग माटी मताए अउ गारा अमरे बर जावय। तेकर पाछू एक झन डॉक्टर इहां झाड़ू.-पोंछा के काम करे लगिस। इहें वोला पढ़े अउ आगू बढ़े के माहौल मिलिस। उहां के डॉक्टर अउ नर्समन ले मिलत परोत्साहन के सेती वो आया, फेर नर्स अउ फेर नर्स ले डॉक्टर के पदवी तक पहुंच गे। फेर एक दिन अइसनो आइस जब वो दूसर के अस्पताल म नौकरी छोड़ के खुद के अस्पताल चलावत हे।
सिरतोन म भोला! लोगन के विकास के किस्सा तो सुनथन फेर एकदम से कोइला ले हीरा के दरजा पावत कमतीचझन ल देखथन। तैं सही काहत हस जया। तभे तो सरकार ह वोला नारी सक्ति सम्मान दे के फइसला ले हे। अवइया रास्टरीय परब म वोला हमर राज के मुख्यमंतरी ह सासन डहर ले सम्मान करही।
फेर भोला, वोला अपन ये संघर्स के दिन म अपन जोड़ी के सुरता नइ आइस? दगाबाज के सुरता कर के काय करतिस। तभो ले जिनगी म एक संगवारी के, एक परिवार के जरूरत तो घलो होथे न। तभे तो जिनगी के आखरी घड़ी ह पहाथे।
हां जया, तोर कहिना सही हे। फेर अब वोकर परिवार तो अतेक बड़े होगे हवय के वोला एकठन घर म सकेले नइ जा सकय। जतकाझन के दवई-पानी करथे, रोग-राई ले छुटकारा देवाथे, सब वोकर परिवार के हिस्सा बनत जाथें।
हां, ये तो भौतिक परिवार होइस। फेर अंतस के सुख तो कुछु अउ खोजथे न।
तोर कहिना सही हे जया। फेर अंजलि ऐकरो रस्ता निकाल डारेे हे। मन के सुख अउ सांति के खातिर वोहा अपन तीर-तखार के कलाकारमन ला जोर के एकठन सांस्करीतिक समिति बना डारे हे। तैं तो सुनेच होबे के संगीत ह आत्मा ल परमात्मा तक पहुंचाए के सबले सुग्घर अउ सरल रस्ता होथे। ऐकरे सेती ऐला असली सुख अउ सांति के माध्यम कहे जाथे।
अच्छा-अच्छा त अंजलि ह डॉक्टरी के संगे-संग कलाकारी घलो करथे।
हां जया, तन के सुख के संगे-संग वोहा लोगन ल मन के सुख घलो बांटथे।