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चुनई झरिस तहां ले मतदातामन ल सब भुला जथें

locationरायपुरPublished: Dec 11, 2023 03:59:20 pm

Submitted by:

Gulal Verma

लोकतंत्र म आम जनता के महत्तम ल बने ढंग ले बताय गे हे। ‘जनता बर, जनता दुवारा, जनता के सरकार’ के बात ह ए बात ल सच साबित घलो करथे। फेर, आजकाल राजनीति के हाल ए होगे के कि नेतामन के संबंध जनता से ‘मकरी के जाला’ कस हो गे हे।

चुनई झरिस तहां ले मतदातामन ल सब भुला जथें
मितान! बस ए ‘चुनई के चार दिन’ ल छोड़ दे, तहां सबो दिन एके बरोबर हे। न पूछ-परख, न मान-सम्मान। न जोहार, न पांव पैयलगी। वोट डरइस तहां उलटा गंगा बोहाय के सुरू हो जथे। वोट डार के निकलइया अउ वोट डारे बर जवइया के बीच म फरक सिद्धो-सिद्धो देखे जा सकत हे। वोट देके बाहिर निकलइया के हालत आमा चूस के फेंके गुठली बरोबर हो जथे। अउ वोट डारे बर जवइयामन के मान-गउन ‘बराती’ बरोबर होथे।

सिरतोन! वोट डारे के बाद लोगनमन बड़ सोच-बिचार म बुड़े रहिथें। का हमन सिरिफ मतदाता आन। वोट डारव अउ फेर अवइया चुनई तक राम-राम। न सत्तापक्छ पूछय अउ न बिपक्छ। जनता तो चाहथे सममुच म बनय ‘अपन सरकार।’ अइसे लगथे के चुनई लड़ई ह पूंजीपतिमन के ’जन्म सिद्ध अधिकार’ बन गे हे।

मितान! राजनीति ह खाई कस हे। जेमा जतके खाल्हे उतरबे, वोतके अचंभा बात जाने, देखे, सुने बर मिलही। आजकाल राजनीति ह ’कुलुप अंधिकार खोल’ बन गे हे। राजनीति के चाल, चलन अउ चरित बदल गे हे। नेतामन के सोच अउ बेवहार म लोकतंत्र, जनता अउ देस के हित के मुताबिक बदलाव ह तो असंभव जान परथे। जइसे- रात म सुरूज निकलई।’ कतेक डरडरावन हे ए सोचई के, आज नेतामन ‘राजा-महाराजा, सहंसाह, सम्राट कस लोकतंत्र ल चलाय बर चाहत हावंय। वोकरेमन कस सासक बन के सासन करे बर चाहत हें।

सिरतोन! लोकतंत्र म आम जनता के महत्तम ल बने ढंग ले बताय गे हे। ‘जनता बर, जनता दुवारा, जनता के सरकार’ के बात ह ए बात ल सच साबित घलो करथे। फेर, आजकाल राजनीति के हाल ए होगे के कि नेतामन के संबंध जनता से ‘मकरी के जाला’ कस हो गे हे। आखिर म ए जाला म उलझ के तड़पे के नियति जनता के हे। वइसे तो चुनई के बेरा नेतामन ‘गुड़ म माछी’ कस आमलोगन के तीर म भिनभिनावत रहिथें। फेर, चुनई सिराइस तहां ले वोकर सुख-चैन भर ल नइ लुटंय, बल्किन खून ल घलो चुहक लेथें। जबकि आमलोगन नइ होही त नेतामन ल कोनो पूछही घलो नइ। नेतामन के सबो महत्ता ह आमलोगन के सेती हे। जइसे कोइला के खदान म दबे हीरा, समुंदर के भीतर छुपे मोती के कीमत ह घलो लोगनमन के हाथ म आए के बाद होथे।

जब सरकार ह जनता बर होथे। सबो के हित के जिम्मेदारी सरकार के होथे। तभो ले कतकोन बछर ले जनतेच ह तकलीफ सहत हे। नेतामन के तकदीर बनइया जनता के तकदीर नइ बदल हे। नेतामन सुवारथ के राजनीति ल नइ छोड़त हें, त अउ का-कहिबे।

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