कोरोना के गंभीर मरीजों पर एम्स में होगा प्लाज्मा थैरेपी का क्लीनिकल ट्रायल

50 से अधिक रोगियों का डेटा और प्लाज्मा प्रयोग के लिए रखा गया है सुरक्षित

By: Devendra sahu

Published: 21 May 2020, 06:10 PM IST

रायपुर. राजधानी के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में कोरोना संक्रमित गंभीर रोगियों पर प्लाज्मा थैरेपी का क्लीनिकल ट्रायल होगा। यदि ट्रायल सफल रहता है और मानक संस्थाएं इसे मंजूरी प्रदान करती हैं तो कोविड-19 के गंभीर रोगियों को प्लाज्मा थैरेपी की मदद से ठीक किया जा सकेगा। इस संबंध में एम्स के निदेशक प्रो. नीतिम एम. नागरकर ने आईसीएमआर के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और परियोजना से जुड़े चिकित्सकों से विस्तृत चर्चा कर चुके हैं।
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के निर्देशन में देशभर के चिकित्सा संस्थानों में कोवल्सेंट प्लाज्मा थैरेपी का क्लीनिकल ट्रायल किया जा रह है। एम्स भी पिछले ढाई माह में 75 से अधिक रोगियों का इलाज करने के बाद इस ट्रायल का हिस्सा बन गया है। एम्स निदेशक का कहना है कि प्रदेश में यदि गंभीर मरीज मिलता है तो कोरोना के दुष्प्रभावों को रोकने के लिए प्लाज्मा थैरेपी का क्लीनिकल ट्रायल किया जाएगा। इसके साथ ही परखा जाएगा कि एंटी सार्स कोव-2 प्लाज्मा का उपचार रोगियों पर सुरक्षित है या नहीं। प्रो. नागरकर का कहना है कि वर्तमान में कोविड-19 का कोई भी उपचार उपलब्ध नहीं है। प्रारंभिक शोध में प्लाज्मा थैरेपी को अधिक उपयुक्त माना जा रहा है। ऐसे में इसकी क्लीनिकल प्रमाणिकता को परख कर सुरक्षित पाए जाने पर इसका बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जा सकता है। प्रदेश में अभी तक एक भी गंभीर मरीज नहीं मिले हैं। यहां तक कि किसी को वेंटिलेटर तक की जरूरत नहीं पड़ी है।
ट्रायल में 18 वर्ष से अधिक वाले मरीज होंगे शामिल
रिसर्च प्रोटोकॉल के अनुसार इस ट्रायल में उन रोगियों को शामिल किया जाएगा जो 18 वर्ष से अधिक आयु के हैं और उनके रक्त से संबंधित डोनर प्लाज्मा उपलब्ध है। इसमें गर्भवती महिलाओं, स्तनपान करा रही महिलाओं और किसी अन्य ट्रायल से संबंधित रोगियों को शामिल नहीं किया जाएगा। एम्स में वर्तमान में कोविड-19 के 75 से अधिक रोगियों का या तो उपचार किया जा रहा है या किया जा चुका है। ऐसे में इन रोगियों और उनके परिजनों की सहमति लेकर उन्हें क्लीनिकल ट्रायल का भाग बनाया जा सकता है।
इंटरवेंशन और कंट्रोल आर्म ग्रुप
क्लीनिकल ट्रायल के अंतर्गत इंटरवेंशन और कंट्रोल आर्म ग्रुप बनाए जाएंगे, जिसमें इंटरवेंशन आर्म में शामिल रोगियों को 200 मिली का कोवल्सेंट प्लाज्मा दिया जाएगा जबकि कंट्रोल ग्रुप में सामान्य उपचार प्रदान किया जाएगा। इन रोगियों का एक, तीन, सात, 14 और 28 दिनों में प्रथम ट्रांसफ्यूजन के बाद परीक्षण किया जाएगा। इस डेटा को देशभर के संस्थानों से प्राप्त करने के बाद आईसीएमआर क्लीनिकल ट्रायल के परिणामों और प्रभावों का विश्लेषण करेगा।

यह है प्लाज़्मा थैरेपी
विशेषज्ञों का कहना है कि डोनेट किए गए प्लाज़्मा से प्राप्त एंटीबाडी कोरोना वायरस से लडऩे में सहायक होगी। प्लाज़्मा थैरेपी में कोरोना संक्रमित मरीज के ठीक हो जाने के कम से कम 14 से 28 दिन बाद उसके खून से प्लाज़्मा निकाला जाता है। इससे सही हो चुके रोगी के एंटीबाडी तत्व दूसरे रोगी के शरीर में जाते हैं। ऐसा करने से संक्रमित व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता तेजी से बढ़ती है। इससे उसका कोरोना संक्रमण जल्द ठीक होने की संभावना बढ़ती है।

Devendra sahu Desk
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