छत्तीसगढ़ को कोरोना ने दिए 2000 मौतों के गहरे जख्म... और कितने

- 29 मई को पहली मौत से 30 अक्टूबर तक 184 दिन गुजरे, हर रोज 11 मौत हो रही दर्ज .
- 38 प्रतिशत मौतों की वजह सिर्फ और सिर्फ कोरोना .

By: Bhupesh Tripathi

Published: 30 Oct 2020, 11:57 PM IST

रायपुर. 29 मई 2020 को प्रदेश में कोरोना वायरस से संक्रमित पहले मरीज की मौत हुई थी। बिरगांव नगर निगम अंतर्गत निवासरत 34 वर्षीय मजदूर ने निजी अस्पताल में दम तोड़ा था। इस खबर से पूरा प्रदेश दहशत में था। शासन-प्रशासन सबकी नींद उड़ गई थी। पूरा बिरगांव सील कर दिया गया था। स्वास्थ्य विभाग का पूरा अमला झोंक दिया गया था। एक वो दिन था, एक आज का दिन है जब छत्तीसगढ़ के सीने में 2,000 मौतों के जख्म है। आंकड़े बताते हैं कि 184 दिन में 2 हजार मौतें हो चुकी हैं, यानी हर दिन औसतन 11 मौतें रिपोर्ट हो रही हैं। मगर, गंभीर किसी भी स्तर पर दिखाई नहीं दे रही। न हमारे-आपके स्तर पर, न शासन-प्रशासन के स्तर पर।

'पत्रिका' पड़ताल में सामने आया कि जिलों में हर स्तर पर लापरवाही बरती जा रही है। मौत के आंकड़े सही रिपोर्ट नहीं हो रहे। वरना संख्या २ हजार से कहीं अधिक होती। सितंबर में ९५७ मौतें हुईं, और अक्टूबर में अब तक १,०५० से अधिक। वर्तमान में डेथ रेट १.०५ पर बना हुआ है। भले ही रिकवरी रेट में कमी आ रही हो मगर मौतों को रोकना आज पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। प्रदेश के सरकारी-गैर सरकारी अस्पतालों के आईसीयू, वेंटीलेटर पर ३०० से अधिक मरीज हैं।

सरकार को चाहिए मैदानी स्तर पर निगरानी
वर्तमान में संक्रमित मरीजों में वायरस लोड कम है। मगर, उन मरीजों में एकदम से बढ़ रहा है जो अन्य किसी बीमारी से ग्रसित हैं। इसलिए चाहिए कि ५० वर्ष से अधिक आयुवर्ग और पूर्व से किसी बीमारी से ग्रसित व्यक्तियों की सूची तैयारी करवाई जाए। जो संभवता सामुयादिक सर्वे में बनी थी। उन सभी पर मैदानी अमले से निगरानी करवाई जाए। जैसे- एएनएम, मितानीन...। क्योंकि ये ही लोग कोरोना के शिकार हो रहे हैं।

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वे राज्य जहां २००० से अधिक मौतें

राज्य- मौतें

महाराष्ट्र- ४३,७१०
कर्नाटक- ११,०९१

तमिलनाडू- ११,०५३
उत्तरप्रदेश- ६,९८३

पश्चिम बंगाल- ६,७२५
आंध्रप्रदेश- ६,६५९

दिल्ली- ६,४२३
पंजाब- ४,१६८

गुजरात- ३,७०८
मध्यप्रदेश- २,९२९

(नोट- शुक्रवार रात ८ बजे की रिपोर्ट के मुताबिक देश में १,२१,१४२ मौतें रिपोर्ट)
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अब लापरवाही पड़ रही बहुत भारी-
हमारी लापरवाही-

१- कोरोना के लक्षण होने पर हम जांच नहीं करवा रहे। घर में किसी सदस्य में लक्षण दिखाई देने पर उन्हें मुफ्त में हो रही जांच करवाने तक नहीं ले जा रहे।
२- त्योहारी सीजन में खरीदी की जानी चाहिए, मगर गाइड-लाइन का पालन करते हुए। ग्राहक तो छोडि़ए दुकानदार तक मास्क लगाए नहीं दिखते।
३- सोशल डिस्टेंसिंग की गाइड-लाइन मानों मजाक बन गई है। किसी दुकान में, किसी संस्थान में इसका पालन नहीं करवाया जा रहा।

प्रशासनिक लापरवाही-

१- संक्रमित मरीजों को ढूंढऩे की कवायद, संक्रमित मरीज के कांटेक्ट वालों को खोजने की कवायद (कांटेक्ट ट्रेसिंग), कंटेनमेंट जोन घोषित करना, संक्रमित मरीजों के घर स्टीकर चस्पा करना, परिवार के सदस्यों की सैंपलिंग जैसी सारी कवायद अब बंद है। (जिम्मेदार- स्वास्थ्य विभाग, नगर निगम, जिला प्रशासन)

२- कई जिलों में कोरोना डेथ ऑडिट कमेटी का अब तक गठन नहीं हुआ है। जहां हुआ, उन्हें डेथ ऑडिट कैसे करना है इसकी पूरी जानकारी नहीं है, तभी तो जुलाई, अगस्त, सितंबर में हुई मौतों की रिपोर्ट अक्टूबर में जारी हो रही हैं। इनमें रायपुर, दुर्ग, कोरबा जैसे बड़े जिले भी शामिल हैं। तभी तो शनिवार को जिला टीम को प्रशिक्षण दिया जाना तय हुआ है।

(जिम्मेदार- स्वास्थ्य विभाग, जिला प्रशासन)

३- नियमों का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध सिर्फ १००-२०० रुपए का जुर्माना काफी नहीं। सख्त कार्रवाई जरूरी है। (जिम्मेदार- नगर निगम)

एक्सपर्ट व्यू-
वर्तमान में ७५-८० प्रतिशत के करीब मरीज होम आइसोलेशन में हैं। २० प्रतिशत अस्पताल और कोविड केयर सेंटर में। इन्हें इलाज मिल रहा है। अब हमारी नैतिक जिम्मेदारी है कि पटाखें फोड़ें या न फोड़ें। इस पर प्रशासन को भी ठोस निर्णय लेने की जरुरत है। जरुरत पडऩे पर ही घरों से निकलेंगे तो कार-बाइक का इस्तेमाल कम होगा, ताकि प्रदूषण कम हो। और हम अगर घर से कम से कम निकलेंगे तो संक्रमण की संभावना उतनी कम होगी।
डॉ. कमलेश जैन, प्रोफेसर, कम्यूनिटी मेडिसीन, पं. जेएनएम मेडिकल कॉलेज

व्यक्ति लक्षण होने पर भी समय पर जांच नहीं करवा रहे। गंभीर स्थिति में अस्पताल आ रहे हैं, या रेफर हो रहे हैं। सभी को जागरूक होना होगा। विभाग की तरफ से इलाज में कहीं कोई कमी नहीं है, सभी सुविधाएं हैं।
डॉ. सुभाष पांडेय, प्रवक्ता एवं संभागीय संयुक्त संचालक, स्वास्थ्य विभाग

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