भू-अभिलेख: IIT और राजस्व विभाग के स्केल में फर्क के कारण गड़बड़ी

इस नए सिरे से तैयार करने का जिम्मा आइआइटी रूडक़ी को दिया गया था

By: Deepak Sahu

Published: 30 Dec 2018, 09:31 AM IST

जितेन्द्र दहिया@रायपुर. जिले में 216 गांवों के नक्शे और सीमाएं मिट चुकी हैं। इस नए सिरे से तैयार करने का जिम्मा आइआइटी रूडक़ी को दिया गया था। 2015 में इसके लिए शासन स्तर पर एमओयू हुआ था। लेकिन आइआइटी रूडक़ी के द्वारा दी गई 3 गांवों की रिपोर्ट प्रदेश के भू-अभिलेख विभाग के काम नहीं आ रही है। इस वजह से राजस्व अधिकारियों को आइआइटी से मिले नक्शे के मिलान का जिम्मा दिया गया है।

इससे गावों की सीमाओं की पता चलेगा। आइआइटी ने अब तक जिले के धनेली-सांकरा, खुरमुड़ी और कुम्हारी गांव की सीमाओं की नाप-जोख की है। जिले में कुल 448 गांव हैं, जिसमें से 216 गांव की सीमाओं को नापने का जिम्मा दिया गया था। आइआइटी और राजस्व विभाग की स्केल अलग-अलग होने के कारण दोनों के नक्शे में बड़ा अंतर देखने को मिल रहा है।

रायपुर शहर में भी 8 इलाके शामिल
भू-अभिलेख शाखा के रेकॉर्ड के मुताबिक कई गांवों के नक्शे वर्ष 1927 मिसल अभिलेख के थे। वैसे तो ये नक्शे तहसीलों में रहते हैं, लेकिन सुधार के लिए जिला कार्यालय लाए जाते हैं। जिन 216 गांवों के नक्शे नष्ट हुए हैं, उनमें रायपुर शहर के भी 6 इलाके हैं। इनमें तिल्दा क्षेत्र के भी शामिल हैं।

इसलिए आया नक्शे में फर्क
रुडक़ी की टीम ने 2015 में अगस्त से काम शुरू किया था। राजस्व अधिकारियों के मुताबिक प्रदेश के राजस्व विभाग का पैमाना 1:4000 है। इसके अलावा आबादी जमीन का पैमाना 1:500 उपयोग में लाया जाता है। जबकि आइआइटी रूडक़ी ने 1:1000 के पैमाने से नाप-जोख की है। इसलिए दोनों नक्शे अलग हो रहे हैं।

नक्शा न होने से सीमांकन और अन्य कामों में आती है रूकावट
किसी भी गांव का नक्शा नष्ट होने से सभी राजस्व काम रूक जाते हैं। सीमांकन नहीं हो सकता। डायवर्सन नहीं हो पाता। यहां तक कि उसकी रजिस्ट्री भी रुक जाती है। रजिस्ट्री इसलिए, क्योंकि सभी जगह जमीनों की दर शासन तय करता है। जिस जमीन की जद ही नहीं मालूम उसकी दर कैसे तय की जा सकेगी। दर तय होने के बाद ही उसकी खरीदी-बिक्री हो पाती है।

फैक्ट फाइल
216 गांवों के नक्शे नष्ट (रायपुर जिला)
1:4000 राजस्व विभाग का स्केल
1:500 आबादी जमीन का स्केल
1:1000 आइआइटी का स्केल

इसके बाद पड़ी जरूरत
नक्शे नहीं होने का खुलासा राजस्व अभिलेख की जांच में हुआ। नक्शे नहीं होने से लोगों को उनकी जमीनों के अभिलेख उपलब्ध नहीं करवा पा रहे हैं। इसके चलते कौन सी जमीन कहां तक है, यह पता नहीं चल पा रहा है। गड़बडिय़ां भी हो रही हैं।

सुरक्षित रखने करवाते हैं लेमिनेट
पटवारी, राजस्व निरीक्षक और एसएलआर के चेक करने के बाद नक्शा अपना रूप लेता है। इसे प्रिंट कराकर तहसीलों में भेजा जाता है। नक्शे की वैल्यू तय समय तक ही होती है। तहसीलों में बैठे अधिकारी-कर्मचारियों की लापरवाही के कारण इन नक्शों की मूल कॉपी नष्ट हो जाती है।

भू-अभिलेख के अधीक्षक मो. इस्ताक इराकी ने बताया कि किसी भी जमीन की पहचान के लिए उसका नक्शा बहुत मायने रखता है। जिन गांवों का नक्शा नष्ट हो चुका है, उसके सर्वे के लिए रुडक़ी आइआइटी की टीम सर्वे कर रही। इनके नए नक्शे तैयार किए जाएंगे।

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