चैनल्स की भीड़ में गुम सा हो गया दूरदर्शन, कभी सभी दर्शकों का था मनपसंद

खरोरा. दो से तीन सौ चैनल्स की भीड़ में आज दूरदर्शन कहीं गुम सा हो गया है।

By: dharmendra ghidode

Updated: 27 Nov 2019, 12:16 AM IST

खरोरा. दो से तीन सौ चैनल्स की भीड़ में आज दूरदर्शन कहीं गुम सा हो गया है। आज हर किसी की अलग पसंद के लिए हर किसी के पास एक अलग चैनल है। अगर आपको एक्शन पसंद है तो आप एक्शन चैनल लगा सकते हैं। अगर आपको गाने सुनने हैं तो एक बटन की दूरी पर आप गाने सुन सकते हैं। यही नहीं नए गाने या पुराने गाने सुनने के लिए भी अलग-अलग चैनल्स हैं। लेकिन जैसा आज है वैसा पहले 80-90 दशक में नहीं था।
टेलीविजन की शुरुआत में दूरदर्शन ही एकमात्र चैनल सभी के पास होता था। उस वक्त शख्स अपने हिसाब से शो नहीं, बल्कि शोज के हिसाब से खुद को ढालता था। उस दौर में न सिर्फ टीवी शोज बल्कि विज्ञापनों का भी जबरदस्त क्रेज देखने को मिलता था। ऐसे में आज भी कई ऐसे विज्ञापन हैं जो दर्शकों के दिल में बसे हैं और नाम मात्र लेने से ही घंटों उसकी यादों में बातें होने लगती हैं।
पाश्चात्य संस्कृति के अनुसरण के चलते आज की युवा पीढ़ी जहां एडवांस हो गई है, वहीं परिवार के सभी सदस्यों को एक साथ बैठकर टीवी पर कार्यक्रम देखने का अवसर देने वाले राष्ट्रीय चैनल दिल्ली दूरदर्शन की लोकप्रियता भी न के बराबर रह गई है। पहले दिल्ली दूरदर्शन पर सप्ताह में दो बार शनिवार व रविवार को प्रसारित होने वाली फिल्मों से लोग अपना मनोरंजन करते थे।
दिल्ली दूरदर्शन देखने वाले लोग भी अब डिजीटल तकनीक द्वारा फिल्मों का लुत्फ उठाते देखे जा सकते हैं। लोगों के घरों में टेलीविजन स्टेटस सिंबल हुआ करते थे और 80 के दशक से पूर्व किसी-किसी के घर में ब्लैक एंड व्हाइट टेलीविजन ही होते थे।
बुजुर्गों भोला प्रसाद सोनी (60), राधेलाल यादव (62) की माने तो भारत में 1982 के बाद रंगीन टेलीविजन आए। जिस घर में भी रंगीन टेलीविजन होता था, उसमें कोई भी कार्यक्रम देखने का एक अलग ही उत्साह होता था और वहां कार्यक्रम देखने के लिए पड़ोस के लोगों की भीड़ होती थी। फिर 1991 में जमाना आया केबल नेटवर्क का, जिसने हर किसी को अपनी और खींचकर अपना दीवाना बना दिया।
धारावाहिकों का रहता था बेसब्री से इंतजार
80 और 90 के दशक में दिल्ली दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले विक्रम बेताल, दादा-दादी की कहानियां, मालगुडी डेज, गुल-गुलशन गुलफाम, लोहित किनारे एक कहानी, द सॉर्ड ऑफ टीपू सुल्तान, मशाल, सांझा चूल्हा, संसार, चाणक्य, हम लोग, रामायण, महाभारत, चंद्रकांता, बुनियाद, विष्णु पुराण, भारत एक खोज, आजादी की कहानी, सर्कस, फौजी, उड़ान, मुर्गा नसरूददीन, अदालत, जंगल बुक, हिमालय दर्शन, चित्रकार सहित कई धारावाहिक प्रसारित होते थे, जिन्हें लोग उत्साह से देखते थे। वहीं डीडी मैट्रो पर प्रसारित होने वाले धारावाहिक जुनून का भी हर किसी को इंतजार रहता था।
घरों से गायब हुए टीवी एंटीना
घरों की छत्तोंं पर पहले टीवी एंटीना हुआ करते थे। नगर निवासी भीषम, बलराम, मुकेश कुमार आदि ने बताया कि उन्हें आज भी वे दिन याद हैं जब दूरदर्शन और डीडी मैट्रो चैनल न लगने के कारण उन्हें अपने छतों पर चढ़कर एंटीना घूमाना पड़ता था और नीचे खड़ भाई-बहन से पूछना पड़ता था कि चैनल लगा या नहीं। चैनल लगने पर खुशी होती और नहीं लगने पर निराशा हाथ लगती थी। दूरदर्शन और डीडी मैट्रो के कार्यक्रम देखने के लिए लोग स्पेशल एंटीना लगाते थे। जैसे-जैसे मनोरंजन की नई-नई तकनीक आने लगी, वैसे-वैसे लोग मनोरंजन के नए-नए साधनों का इंतजाम करने लगे।
केबल नेटवर्क ने टेलीविजन को दिलाई एक नई पहचान
बुद्धू बक्सा कहे जाने वाले टेलीविजन को केबल नेटवर्क ने एक नई पहचान दी। इसमें विभिन्न टीवी चैनलों पर प्रसारित होने वाले अनेक कार्यक्रम और फिल्मों ने लोगों को काफी आकर्षित किया। इन टीवी चैनलों में न्यूज चैनल, भक्ति चैनल, मूवी चैनल, कार्टून चैनल ने अपना एक विशेष स्थान बनाया। अब दौर आया है डिजीटल तकनीक का, जिसके माध्यम से थ्रीडी मूवी और बढिय़ा साउंड सिस्टम के साथ डिजिटल प्रिंट में फिल्में देखने का। इस तकनीक ने बहुत ही कम समय में लोगों को आकर्षित कर अपना एक खास स्थान बना लिया। धीरे-धीरे जहां इस उद्योग का प्रसार हो रहा है, वहीं दर्शकों की संख्या में भी लगातार वृद्धि होती जा रही है।

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