छत्तीसगढ़ में 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है बिजली की दरें

बिजली मामले में सप्लस स्टेट छत्तीसगढ़ के उपभोक्ताओं को मार्च 2020 में आने वाला बिजली बिल करंट मार सकता है। क्योंकि बिजली कंपनी 3 हजार करोड़ रुपए के 'नोशनल लॉस में है। यह घाटा बीते 10 सालों से लगातार बढ़ता जा रहा है और कंपनी इससे उबर नहीं पा रही है। इसके दो ही विकल्प हैं, पहला कंपनी इस भारी-भरकम राशि की वसूली करे या फिर जनता पर बोझ डालकर इसे शून्य कर दिया जाए।

By: Dhal Singh

Published: 18 Feb 2020, 02:10 AM IST

रायपुर. कंपनी सूत्रों के मुताबिक जनरेशन, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ने अपनी आय-व्यय का जो ब्यौरा आयोग को भेजा,उसमें 3 हजार करोड़ रुपए का भी जिक्र है। हालांकि कंपनी ने सीधे-सीधे दरें बढ़ाने के बारे में कुछ नहीं लिखा, मगर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। बिजली कंपनी को प्रत्येक वर्ष 14-15 हजार करोड़ रुपए का खर्च बैठता है। तो 3 हजार करोड़ रुपए का 'नोशनल लॉस, 15 हजार करोड़ रुपए का 20 प्रतिशत होता है। तो इस 20 प्रतिशत की भरपाई के लिए दरों में 10-20 प्रतिशत तक की वृद्धि का अनुमान लगाया जा रहा है। आयोग फरवरी के अंत या फिर मार्च की शुरुआत में तय दरें सार्वजनिक करके सुझाव मांगेंगा। नई दरें एक अप्रेल से लागू करनी ही होंगी।

कंपनी अफसरों के तर्क, दरें बढ़ाना ही विकल्प
'पत्रिका ने जनरेशन, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन तीनों कंपनियों के अधिकारियों से बात की। इन्होंने कहा कि महंगाई के हिसाब से दरों में हर साल पांच प्रतिशत की वृद्धि करनी चाहिए। ऐसा नहीं करने पर अंतत: जनता पर ही ज्यादा भार आता है। अधिकारियों का कहना है, कंपनी को बचाना है तो दरें बढ़ानी ही होगी। शैलेंद्र शुक्ला, अध्यक्ष, बिजली कंपनी का कहना है कि आय-व्यय का ब्यौरा आयोग को भेज दिया है। उसमें सब कुछ उल्लेख है। कंपनी घाटे में नहीं है, लेकिन नोशनल लॉस जो 10 सालों का है वो तो है ही।

बोर्ड ने पास कर दिया था प्रस्ताव
कंपनियों ने बोर्ड के समक्ष दरों में वृद्धि का प्रस्ताव रखा, जो पास कर दिया गया था। मगर इस पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से कंपनी के अफसरों ने चर्चा ही नहीं की थी। इसलिए आयोग को प्रस्ताव भेजने में देर पर देर होती चली गई। अंत में समय-सीमा बीत गई और आयोग को स्वयं ही संज्ञान लेकर, कंपनियों को नोटिस भेजा। जिसके बाद कंपनियों ने आय-व्यय का ब्यौरा भेजना शुरू किया। अब दरों में वृद्धि करनी है या फिर नहीं, यह आयोग के हाथ में है।

यह होता है नोशनल लॉस
सरकार स्टील उद्योग, माइनिंग व अन्य उद्योगों के लिए टैरिफ का निर्धारण करती है। स्टील उद्योग को 80 पैसे प्रति यूनिट तक सस्ती बिजली मिलती है, जिसकी भरपाई सरकार बिजली कंपनी को करती है। बीते कई वर्षों से यह राशि भी सरकार ने कंपनी को नहीं दी है। कम टैरिफ की बिजली से भी नुकसान हुआ। इसके अलावा मड़वा प्लांट से पड़ोसी प्रदेश को बेची गई बिजली का राशि की वसूली भी नहीं हो पा रही है।

Dhal Singh Desk
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