नृत्य और नाटक के साथ संगीत की बारीकियां सीख रहे भावी शिक्षक

लोक संगीत, फिल्मी गीत है जिसे हम लोकगीत समझते हैं यह दुर्भाग्य है। नाटक के माध्यम से बच्चों के मनोविज्ञान को समझ कर हम उन्हें ज्यादा समझा सकते हैं। संगीत से व्यक्ति की संवेदनाएं जुड़ी होती हैं और संगीत निकाल दिया जाए तो संवेदनाएं जैसे खुशी-गम को व्यक्त नहीं कर पाएगा।

By: Yagya Singh Thakur

Published: 21 Feb 2020, 01:14 AM IST

रायपुर द्य शंकर नगर स्थित गवर्नमेंट बीएड कॉलेज में भावी शिक्षकों में छिपी प्रतिभा को निखारने के लिए 17 फरवरी से 10 दिवसीय कला शिक्षा रंगमंच कार्यशाला की शुरुआत हो चुकी है। कलाकार के रूप में इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय खैरागढ़ से विभिन्न विभागों से आए प्राध्यापक नृत्य, संगीत, नाट्य कला, लोक संगीत, गीत, वादन की बारीकियां सिखा रहे हैं।
ललित कला के प्रोफेसर डॉ. राजन यादव ने कहा, कला संस्कृति की अभिव्यक्ति है। कला सृष्टि की कमियों को पूर्ण करती है। वह सीमाओं को तोड़कर संपूर्ण विश्व को एक कर देती है। कला से हीन व्यक्ति पशुवत कहा गया है। आनंद को कला का मूल माना गया है। भारत की संस्कृति अद्वितीय है जिसकी अभिव्यक्ति भी कला जैसे नृत्य संगीत स्थापत्य कला के माध्यम से होती है। जिसे सीखने पूरे विश्व से लोग भारत आते हैं। उन्होंने सत्यम शिवम सुंदरम की सार्थकता बताते हुए कहा कि कला न केवल मनोरंजन का साधन है बल्कि व्यवसाय, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि से भी विशेष रूप से जुड़ा है। वर्तमान समय में शिक्षक कला के माध्यम से बच्चों को सही मार्गदर्शन देने व एक अच्छा इंसान बनाने में सहयोग कर सकते हैं।
जुड़ी हुईं हैं मनुष्य की संवेदनाएं: भरतनाट्यम की कलाकार सहायक प्राध्यापक मेदिनी होम्बल ने नृत्य का इतिहास बताते हुए कहा कि नृत्य करते हुए नटराज ने जब अपना डमरू बजाया वहीं से 14 सूत्रों की उत्पत्ति हुई। कामदेव ने संध्या नामक स्त्री और ब्रह्मा पर तीर चलाया जहां से 64 कलाओं का जन्म हुआ। केवल कृष्ण ही इन 64 कलाओं से पारंगत थे। उनके द्वारा भरतनाट्यम की शुरुआत किस प्रकार की जाती है। डॉक्टर बिहारीलाल तारम ने लोकगीतों पर कहा कि हम रंगकर्म को शिक्षा से कैसे जोड़ सकते हैं। लोक संगीत, फिल्मी गीत है जिसे हम लोकगीत समझते हैं यह दुर्भाग्य है। नाटक के माध्यम से बच्चों के मनोविज्ञान को समझ कर हम उन्हें ज्यादा समझा सकते हैं। संगीत से व्यक्ति की संवेदनाएं जुड़ी होती हैं और संगीत निकाल दिया जाए तो संवेदनाएं जैसे खुशी-गम को व्यक्त नहीं कर पाएगा।
सहायक प्राध्यापक विवेक नवरे ने सात सुरों के संगीत 12 स्वर आदि को बताते हुए सरोद से राग तोड़ी तथा विभिन्न रागों के गीत प्रस्तुत किया। सहायक प्राध्यापक हरिओम हरि ने तबले के माध्यम से विभिन्न ताल व लय से अवगत कराया। निलेश वर्मा और सहायक अध्यापक दिनेश कुमार देवदास ने संगीत की दो धाराएं जिसमें हिंदुस्तानी संगीत व कर्नाटक शैली की जानकारी दी। शास्त्रीय संगीत व सुगम संगीत पर बताया कि एक ही सुर होते हुए कैसे राग बदल जाता है। नाद, राग को परिभाषित करते हुए कहा कि जो स्वर में स्थित है वही स्वस्थ है। जिस प्रकार खेल में खिलाड़ी को तैयार करने के लिए व्यायाम कराया जाता है वैसे ही गायन के लिए विद्यार्थी के गले को तैयार किया जाता है वर्तमान में संगीत में टेक्नोलॉजी का भी प्रभाव देखने मिलता है। मनुष्य के जीवन के हर संस्कार से संगीत जुड़ा है उन्होंने बताया कि विभिन्न राग के गायन का निश्चित समय होता है। इसके बाद दोनों कलाकारों ने जुगलबंदी करते हुए विभिन्न गीतों से संबंधित गीत कौन गली गए श्याम.... भगवान मेरे घर आए थे... और गजल कभी वह भी आए मेरी आंख में...., तुम रस्में मोहब्बत का सिला क्यों नहीं देते...., जैसे गीत प्रस्तुत किए।

Yagya Singh Thakur
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